गुरुवार, 6 अगस्त 2009

अपराध की दुनिया दुनिया दल दल


अपराध की दुनिया दुनिया दल दल
फंस जाए जो भी वो पाए न निकल
सोचने बैठे कभी तो सोचता ही रहे
किसी तरह न सूझे कोई उसको हल।

पता नहीं जाने कब क्या हो जाए
मारने को निकले ख़ुद मर जाए
मौत मडलाये सिर पर हर एक पल।

छुप छुप जीना भी कोई जीना है
ऐसे जीवन ने सुख चैन छीना है
आज का भरोसा नहीं क्या होगा कल।

पीछा न छोडे कर्मों का लेखा जोखा
काटता वो ही इन्सां जो भी वो बोता
भोगना ही पड़ता यहाँ कर्मों का फल।

6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! बहुत सुंदर कविता लिखी है आपने...

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  2. छुप छुप जीना भी कोई जीना है
    ऐसे जीवन ने सुख चैन छीना है
    बढिया ढंग प्रस्तुतिकरण का. सुन्दर

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  3. अपराध की दुनिया दुनिया दल दल
    फंस जाए जो भी वो पाए न निकल
    सोचने बैठे कभी तो सोचता ही रहे
    किसी तरह न सूझे कोई उसको हल।

    क्या खूब छन्द है।
    आपने तो आचार्य केशवदास की याद तरो-ताजा
    कर दी है।
    बधाई।

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  4. आप सभी ब्लोगर मित्रों का मेरा हौसला बढाने के लिए दिल से धन्यबाद!!

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