शनिवार, 22 नवंबर 2014

घर से चली वो जब ही अपने दफ्तर को



घर से चली वो जब ही अपने दफ्तर को
बीच  राह में  बरसो  पानी  बड़ी  जोर है। 
ऊपर  से नीचे तक  भीग गए सारे अंग
सारा  बदन  पानी  में  हुआ  सराबोर है। 
अंग-अंग झलक उठे  मस्ती टपक पड़ी
लोगों की मस्ती का न रहा ओऱ छोर है। 
खुदको ही देख वो लजाई अपने आप में
दबे  पांव  चुप चाप   चली  घर  ओऱ है।
                               -प्रेम फ़र्रुखाबादी

स्वरचित अन्तरा, मतलब निकल गया है तो, पहचानते नहीं



मतलब निकल गया है तो, पहचानते नहीं
यूँ जा रहे हैं जैसे हमें, जानते नहीं


अपनी गरज़ थी जब तो लिपटना क़बूल था
बाहों के दायरे में सिमटना क़बूल था
अब हम मना रहे हैं मगर मानते नहीं।    - साहिर


तेरे  सिवा न  कोई है  मेरा  जहान में
आती है तुझे देख के, जां मेरी जान में
हर  किसी  को पाएं,  हम ठानते  नहीं।  - प्रेम फ़र्रुखाबादी

मतलब निकल गया है तो, पहचानते नहीं
यूँ जा रहे हैं जैसे हमें, जानते नहीं       - साहिर 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

स्वरचित अन्तरा फिल्म - नाटक


फिल्म - नाटक 
जिंदगी         एक       नाटक     है  

हम    नाटक   में   काम   करते  हैं  
पर्दा   उठते    ही,  पर्दा   गिरते  ही
अपने  नाम  बाद   नाम   करते हैं 
हम    नाटक   में   काम   करते  हैं  

खेल में  कभी  बजती  हैं तालियां 
और  कभी  लोग  देते  हैं गलियां 
भले    बनते   ही,   बुरे  बनते  ही 
अपने   नाम   बदनाम   करते  हैं     -आनंद बक्शी
                   
कभी  कभी  हम  ख़ुशी  को मनाते
और   कभी   हम   दुखी   हो  जाते
क्या   कहें   कैसा,  ये   जहाँ   ऐसा
कभी    दाम  बिन    दाम   करते हैँ    - प्रेम फ़र्रुखाबादी

हम    नाटक   में   काम   करते  हैं 
जिंदगी         एक       नाटक     है  
हम    नाटक   में   काम   करते  हैं  
पर्दा   उठते    ही,  पर्दा   गिरते  ही
अपने   नाम     बदनाम   करते  हैं     -आनंद बक्शी
                    

देखो कर्म हमारे कभी हमारा,पीछा नहीं छोड़ें



देखो कर्म हमारे  कभी,  हमारा,पीछा  नहीं छोड़ें
चाहे  कितना  भी  भागें, चाहे कितना  भी  दौड़ें । 

अच्छे    बुरे   कर्म   जो,   हम   से    हो   जाएँ
फल   देने   को  वही   कर्म   साथ  हमारे  पौडें।

आने - जाने   के  फेरों  से,   मुक्ति   वही   पाएं 
परमपिता परमेश्वर से जो,  अपना रिश्ता जोड़ें।

करुणा, प्रेम,  क्षमा  की,  हिलोरें  उनमें ही  उठें
परहित  की  चादर जो,  अपने  मन  पर  ओढ़ें ।

माया ने  भरमाया  हम को,  सब  को  यहाँ पर 
परमानन्द को  चाहें  तो, माया  के बंधन तोड़ें।

बैठ अकेले कहीं ध्यान कर,  जीवन को समझें
फिर  जीवन  को  जीवन  की,  राहों  पर  मोड़ें।

जो  चाहोगे  मिल  जायेगा, तुम को जीवन से 
लेकिन पहले इस जीवन को, अच्छी तरह गोडें।

एक बार मिले यह जीवन,  मिलता नहीं दुबारा
जितना चाहे जैसे चाहें, इस जीवन को निचोड़ें।

कर्म श्रेष्ठ है यही  बताया,  जो भी  जी  के गए
नाकामी का 'कभी ठीकरा,किस्मत पर न फोड़ें।





मोदी मानव ही नहीं, बहुत बड़े हैं संत




मोदी   मानव  ही  नहीं,  बहुत   बड़े   हैं  संत।   

निश्चय ही अब देश का, होगा  उत्कर्ष अनंत।।
होगा  उत्कर्ष  अनंत,   जग   में  नाम   होगा
देखते   रह   जाएँ   सब,  ऐसा   काम   होगा।
कहे  ' प्रेम '  कविराय,  घोषणाएं  की  जो भी
एक  एक  कर अब  उन्हें,  पूरी  करेंगे   मोदी।   

देश-विदेश में छा गये



देश - विदेश  में   छा  गये,योगी   रामदेव      गये
सब  को  दिल  से  भा गये,योगी    रामदेव     गये

अब    कोई  रोगी  होगा,अब    कोई  भोगी होगा

बाबा  की  शरण  में  आके,अब  हर  कोई जोगी होगा

भ्रष्टाचारियों की खैर नहीं,सदाचारियों   से बैर  नहीं

सभी को ये अपना समझें,समझें किसी को गैर नहीं

देश - विदेश  में  छा  गये,योगी   रामदेव     गये

सब  को  दिल  से भा गये,योगी    रामदेव     गये


तुम अब भी ख्यालों में आ जाया करते हो



तुम अब भी ख्यालों में जाया करते हो
आते ही मेरे दिल पर छा जाया करते हो

अरमान भरा दिल तुमने तोड़ दिया था

जीवन का रुख ही तुमने मोड़ दिया था
दूर रहके भी तुम मुझे तडपाया करते हो

मेरे ख्वाबों की रानी तू अब भी बनी बैठी

मेरे दीवाने दिल में तू अब भी सजी बैठी
सपनों को तुम ही सजीव बनाया करते हो

रूप सुहाना तेरा मेरे दिल को लुभाता है

पता नहीं मुझको यह कितना सताता है
तन-मन को तुम ही जगमगाया करते हो



स्वरचित अन्तरा- फिल्म शालीमार



हम    बेवफा   हरगिज   न  थे ,पर   हम   वफ़ा   कर   न  सके.   - आनंद बख्शी


हमने  भी चाहा,तुमने भी चाहा,पर   एक  अपनी   चाह  न  थी
हम भी चले थे, तुम भी चले थे,पर   एक   अपनी   राह  न  थी
दिल से  दीवाने  हो के  भी  हम,दिल  में   जगह   कर   न  सके ।  - प्रेम फ़र्रुखाबादी 

हम    बेवफा   हरगिज   न  थे,पर   हम   वफ़ा   कर   न  सके.   - आनंद बख्शी


स्वरचित अन्तरा मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा



मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा , मैं  नागन तू  सपेरा 
जनम जनम का तेरा मेरा बैर, ओ रब्बा खैर,
मैं  नागन  तू  सपेरा                                                            -  आनंद बक्शी 

आज तो  बदला  मैं बस लूंगी,छेड़ न   मुझको  मैं डस  लूंगी 
जंतर     जंतर    जादू    टोने, ये   तो   मेरे   खेल   खिलौने 
मुझ पर  चलेगा  न जोर तेरा, मैं       नागन      तू      सपेरा  
मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा,मैं       नागन      तू     सपेरा   

इस घर से  क्या मेरा रिश्ता ,तू क्या जाने क्या है किस्सा 
इस  घर  में   है  मेरा  साथी ,साथी   है   वो  जीवन  साथी
जा, चला  जा, ना  डाल  डेरा  मैं       नागन      तू      सपेरा     -  प्रेम फ़र्रुखाबादी 
मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा,मैं       नागन      तू     सपेरा   

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

हम तुम दोनों ही अब दूर न रह पाएं



हम   तुम  दोनों  ही   अब   दूर   न   रह   पाएं 

दूरी   को   देर   तलक  मजबूर   न  सह  पाएं
तुमने   ये   मान   लिया   हमने   ये   मानी है  ( स्वरचित -प्रेम फ़र्रुखाबादी )
जिंदगी और कुछ भी नहीं  तेरी मेरी कहानी है.  - संतोषानंद