शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

किन्तु परन्तु कैसा


स्वरचित अंतरा / फिल्म रोटी कपडा और मकान


अरे हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
अरे हाय हाय हाय मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
हा आ आ आ
कितने सावन बीत गये
कितने सावन बीत गये बैठी हूँ आस लगाये
जिस सावन में मिले सजनवा वो सावन कब आये
कब आये
मधुर मिलन का ये सावन हाथों से निकला जाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
सोच  में डूबी  सोच  रही  हूँ 
कैसी   ये    किस्मत  पायी
दिन का जिसने चैन लिया  
और   रात  की  नींद  उड़ाई                                          स्व रचित अंतरा
समझ समझ कर समझ रही हूँ कुछ भी समझ न आये - प्रेम फ़र्रुखाबादी 
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

मोदी ने गोदी लिया , पूरा भारत देश



मोदी   ने    गोदी   लिया ,   पूरा   भारत    देश।   
अपने  ज्ञान  विवेक  से,  हर  लेंगे   सब  क्लेश।। 
हर लेंगे सब क्लेश ,सुरक्षा चिकित्सा  शिक्षा से।  
जियेगा  जीवन  अब  तो , हर  कोई   इच्छा  से।। 
कहे  ' प्रेम '  कविराय ,  इंतज़ार   करें   विरोधी।  
अपने  किये   वादों  को ,  सिध्द   करेंगे   मोदी।।  
                     -प्रेम फ़र्रुखाबादी