रविवार, 18 अप्रैल 2010

कल जो दोस्त थे वो आज दुश्मन बने बैठे हैं


कल जो दोस्त थे वो आज दुश्मन बने बैठे हैं
दिलोदिमाग की वो आज उलझन बने बैठे हैं

उन्हें दिल से निकलना भी चाहूँ तो भला कैसे
दिल की सचमुच वो आज धड़कन बने बैठे हैं

सकून अब मिलने वाला नहीं दीवाने दिल को
दीवाने दिल की वो आज तड़पन बने बैठे हैं

काश! उनको होश होता अपने इस गुनाह का
अपने गुनाहों का वो आज दरपन बने बैठे हैं

5 टिप्‍पणियां:

  1. इस जमीनी गजल को प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद!
    बहुत बढ़िया!

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  2. काश! उनको होश होता अपने इस गुनाह का
    अपने गुनाहों का वो आज दरपन बने बैठे हैं।



    bahut khub




    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

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