शनिवार, 6 जून 2009

चालीस पार हो गए तो अखरस बतरस लीजिये



चालीस पार हो गए तो अखरस बतरस लीजिये।
जियो और जीने दो, से जीवन का रस लीजिये।

गर जल्दी जाना हो तुमको यह दुनिया छोड़कर
सुबह-शाम जब चाहे सिगरट का कस लीजिये।

जो तुझको जीने न दे किसी तरह से दुनिया में
कुछ न सोचो जैसे तैसे उसको बस डस लीजिये।

मोहब्बत से लोग जहाँ मिल जुल कर रहते हों
उनके बीच जाकर प्यारे एक दम बस लीजिये।

जीवन की आपाधापी में क्यों आग बबूला होते
जो भी मन का मिले उसी के संग हँस लीजिये।

8 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन की आपाधापी में क्यों आग बबूला होते
    जो भी मन का मिले उसी के संग हँस लीजिये।

    वाह..लाख दुखों की एक दवा बता दी आपने...जीवन जीने की कला सिखलाती आपकी ये रचना बहुत अच्छी है...
    नीरज

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  2. प्रेम भाई।
    कविता के माध्यम से बढ़िया सीख दे दीं हैं।
    धन्यवाद।

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  3. chaalees par kar aap to 'nihshabd' (amitabh bchchan wala) nahin hue अखरस बतरस se kam chala rahe hai .lekin mujhe is sundar rachna ne 'nihshabd'kar diya hai...

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  4. गर जल्दी जाना हो तुमको यह दुनिया छोड़कर
    सुबह-शाम जब चाहे सिगरट का कस लीजिये।

    jis andaaz me kahaa hai,ek pal ko lagtaa hai ki cigarette peene ki prerna mil rahi ho!!..par fir sahi sthiti ka andaaza hotaa hai... achhi rachna hai...

    www.pyasasajal.blogspot.com

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  5. जीवन की आपाधापी में क्यों आग बबूला होते
    जो भी मन का मिले उसी के संग हँस लीजिये

    कमाल का लिखते हैं आप.....इस शेर में अपने जीवन का फलसफा लिख दिया है..........लाजवाब है आपकी ग़ज़ल

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  6. वाह वाह!! क्या बेहतरीन लिखा है..आनन्द आ गया.

    जीवन की आपाधापी में क्यों आग बबूला होते
    जो भी मन का मिले उसी के संग हँस लीजिये

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