मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

इस तरह तुम बसे मेरी आँखों में


इस तरह तुम बसे मेरी आँखों में
तेरी खुश्बू सी लगे मेरी सांसों में

खाने को खाया मीठा बहुत मगर
उतना नहीं जितना तेरी बातों में

दिन तो गुजर जाते हैं जैसे तैसे
पर जुदाई खले मुझे तेरी रातों में

कुछ भी सुहाता नहीं है तेरे बगैर
देखूँ तस्वीर लेकर तेरी हाथों में

लगा हुआ पहरा चारों तरफ़ से
जी रही जैसे जीभ मेरी दाँतों में

तुझसा जादूगर हीं होगा कोई
दिल ले गया दो ही मुलाकातों में

7 टिप्‍पणियां:

  1. लगा हुआ पहरा चारों तरफ़ से
    जी रही जैसे जीभ मेरी दाँतों में।

    बहुत खूब कहा भाई आपने. जीने का ये अंदाज़ भी निराला है,

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. दिन तो गुजर जाते हैं जैसे तैसे
    पर जुदाई खले मुझे तेरी रातों में।

    कुछ भी सुहाता नहीं है तेरे बगैर
    देखूँ तस्वीर लेकर तेरी हाथों में ।

    kyaa baat hai, bahut khoob !

    उत्तर देंहटाएं
  3. लगा हुआ पहरा चारों तरफ़ से
    जी रही जैसे जीभ मेरी दाँतों में।

    प्रेम नारायण शर्मा जी।
    आपने हालात का अच्छा चित्रण किया है।

    अगर आप गन्दी और अश्लील टिप्पणियाँ प्रकाशित करेंगे तो
    आपके ब्लॉग पर आना सम्भव नही होगा।
    मुझे बड़ा भाई मानते हो तो मेरी सलाह का भी ध्यान रखना!
    शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut khoob premji, shayad dobara to post nahin ki hai , aisa lagta hai pahle padh chuka hun.

    उत्तर देंहटाएं
  5. यहां अभिव्यक्ति की स्पषटता प्रमुख है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आप सभी ब्लोगर मित्रों का मेरा हौसला बढाने के लिए दिल से धन्यबाद!!

    उत्तर देंहटाएं