गुरुवार, 22 जुलाई 2010

तुमसे मेरी आँखें क्या चार हो गयीं


तुमसे
मेरी आँखें क्या चार हो गयीं
खुशियाँ जीवन में बेशुमार हो गयीं

मिलते मिलते आखिर मिल ही गये
जिन्दगीं दोनों की मजेदार हो गयीं

धरी रह गयीं चालें सारी ज़माने की
कोशिशें अपनी सफल यार हो गयीं

मुहब्बत से जियेंगे सदा खुश रहेंगे
तेरी बाहें मेरे गले की हार हो गयीं


6 टिप्‍पणियां:

  1. मिलते मिलते आखिर मिल ही गये
    जिन्दगीं दोनों की मजेदार हो गयीं।

    बहुत खूब। सुन्दर लगी पंक्तियाँ ।

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  2. मिलते मिलते आखिर मिल ही गये
    जिन्दगीं दोनों की मजेदार हो गयीं

    क्या बात है प्रेम जी ... बहुत खूब ...

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  3. मुहब्बत से जियेंगे सदा खुश रहेंगे
    तेरी बाहें मेरे गले की हार हो गयीं।
    बहुत खूब सुन्दर पंक्तियाँ

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  4. सिंपल येट इफ्फेक्टिव!
    बाऊ जी,
    आप ने बहुत कुछ याद दिलाया!
    कुरेदने के लिए धन्यवाद!

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