शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

स्वरचित अंतरा -मैं तेरे इश्क़ में मर न जाऊँ कहीं



फिल्म - लोफर
 आ
( मैं तेरे इश्क़ में मर न जाऊँ कहीं
तू मुझे आज़माने की कोशिश न कर ) -२
ख़ूबसूरत है तू तो हूँ मैं भी हसीं
मुझसे नज़रें चुराने की कोशिश न कर
मैं तेरे इश्क़ में

शौक़ से तू मेरा इम्तहान ले -२ 
तेरे कदमों पे रख दी है जान ले
बेकदर बेकबर मान जा ज़िद ना कर 

तोड़ कर दिल मेरा ऐ मेरे हमनशीं
इस तरह मुस्कुराने की कोशिश ना कर
ख़ूबसूरत है तू तो हूँ मैं भी हसीं
मुझसे नज़रें चुराने की कोशिश न कर
मैं तेरे इश्क़ में                                       -आनंद बक्शी


तेरी चाहत में पागल मैं हो गयी -२  
तन - मन से घायल मैं हो गयी 
आ ज़रा, पास आ, दूर मुझसे न जा 
मैं तेरी हुई  हूँ जी जान  से
अब मुझे तू सताने की कोशिश न कर. 
मैं तेरे इश्क़ में मर न जाऊँ कही     स्वरचित अंतरा - प्रेम फ़र्रुखाबादी 

ख़ूबसूरत है तू तो हूँ मैं भी हसीं              -आनंद बक्शी
मुझसे नज़रें चुराने की कोशिश न कर
मैं तेरे इश्क़ में



 

शनिवार, 22 नवंबर 2014

घर से चली वो जब ही अपने दफ्तर को



घर से चली वो जब ही अपने दफ्तर को
बीच  राह में  बरसो  पानी  बड़ी  जोर है। 
ऊपर  से नीचे तक  भीग गए सारे अंग
सारा  बदन  पानी  में  हुआ  सराबोर है। 
अंग-अंग झलक उठे  मस्ती टपक पड़ी
लोगों की मस्ती का न रहा ओऱ छोर है। 
खुदको ही देख वो लजाई अपने आप में
दबे  पांव  चुप चाप   चली  घर  ओऱ है।
                               -प्रेम फ़र्रुखाबादी

स्वरचित अन्तरा, मतलब निकल गया है तो, पहचानते नहीं



मतलब निकल गया है तो, पहचानते नहीं
यूँ जा रहे हैं जैसे हमें, जानते नहीं


अपनी गरज़ थी जब तो लिपटना क़बूल था
बाहों के दायरे में सिमटना क़बूल था
अब हम मना रहे हैं मगर मानते नहीं।    - साहिर


तेरे  सिवा न  कोई है  मेरा  जहान में
आती है तुझे देख के, जां मेरी जान में
हर  किसी  को पाएं,  हम ठानते  नहीं।  - प्रेम फ़र्रुखाबादी

मतलब निकल गया है तो, पहचानते नहीं
यूँ जा रहे हैं जैसे हमें, जानते नहीं       - साहिर 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

स्वरचित अन्तरा फिल्म - नाटक


फिल्म - नाटक 
जिंदगी         एक       नाटक     है  

हम    नाटक   में   काम   करते  हैं  
पर्दा   उठते    ही,  पर्दा   गिरते  ही
अपने  नाम  बाद   नाम   करते हैं 
हम    नाटक   में   काम   करते  हैं  

खेल में  कभी  बजती  हैं तालियां 
और  कभी  लोग  देते  हैं गलियां 
भले    बनते   ही,   बुरे  बनते  ही 
अपने   नाम   बदनाम   करते  हैं     -आनंद बक्शी
                   
कभी  कभी  हम  ख़ुशी  को मनाते
और   कभी   हम   दुखी   हो  जाते
क्या   कहें   कैसा,  ये   जहाँ   ऐसा
कभी    दाम  बिन    दाम   करते हैँ    - प्रेम फ़र्रुखाबादी

हम    नाटक   में   काम   करते  हैं 
जिंदगी         एक       नाटक     है  
हम    नाटक   में   काम   करते  हैं  
पर्दा   उठते    ही,  पर्दा   गिरते  ही
अपने   नाम     बदनाम   करते  हैं     -आनंद बक्शी
                    

देखो कर्म हमारे कभी हमारा,पीछा नहीं छोड़ें



देखो कर्म हमारे  कभी  हमारा,पीछा  नहीं छोड़ें
चाहे  कितना  भी  भागें हम, कितना  भी  दौड़ें । 

अच्छे    बुरे    कर्म    जो,   हम   से   हो   जाएँ
फल   देने   को  वही   कर्म,  साथ  हमारे  पौडें।

आने - जाने   के  फेरों  से,  मुक्ति   वही   पाएं 
परमपिता परमेश्वर से जो, अपना रिश्ता जोड़ें।

करुणा, प्रेम, क्षमा की, हिलोरें ,उन में ही, उठें
परहित  की  चादर जो, अपने ,मन ,पर ,ओढ़ें ।

माया ने ,भरमाया, हम ,को ,सब ,को यहाँ पर 
परमानन्द को  चाहें  तो माया  के बंधन तोड़ें।

बैठ अकेले कहीं ध्यान कर, जीवन को समझें
फिर   जीवन   को, जीवन  की, राहों पर मोड़ें।

जो  चाहोगे  मिल  जायेगा, तुम को जीवन से 
लेकिन पहले इस जीवन को,अच्छी तरह गोडें।

एक बार मिले यह जीवन, मिलता नहीं दुबारा
जितना चाहें, जैसे चाहें, इस को आप निचोड़ें।

कर्म श्रेष्ठ है, यही  बताया, जो भी  जी  के गए
नाकामी का 'प्रेम' ठीकरा,किस्मत पर न फोड़ें।





मोदी मानव ही नहीं, बहुत बड़े हैं संत




मोदी   मानव  ही  नहीं,  बहुत   बड़े   हैं  संत।   

निश्चय ही अब देश का, होगा  उत्कर्ष अनंत।।
होगा  उत्कर्ष  अनंत,   जग   में  नाम   होगा
देखते   रह   जाएँ   सब,  ऐसा   काम   होगा।
कहे  ' प्रेम '  कविराय,  घोषणाएं  की  जो भी
एक  एक  कर अब  उन्हें,  पूरी  करेंगे   मोदी।   

देश-विदेश में छा गये



देश - विदेश  में   छा  गये,योगी   रामदेव      गये
सब  को  दिल  से  भा गये,योगी    रामदेव     गये

अब    कोई  रोगी  होगा,अब    कोई  भोगी होगा

बाबा  की  शरण  में  आके,अब  हर  कोई जोगी होगा

भ्रष्टाचारियों की खैर नहीं,सदाचारियों   से बैर  नहीं

सभी को ये अपना समझें,समझें किसी को गैर नहीं

देश - विदेश  में  छा  गये,योगी   रामदेव     गये

सब  को  दिल  से भा गये,योगी    रामदेव     गये


तुम अब भी ख्यालों में आ जाया करते हो



तुम अब भी ख्यालों में जाया करते हो
आते ही मेरे दिल पर छा जाया करते हो

अरमान भरा दिल तुमने तोड़ दिया था

जीवन का रुख ही तुमने मोड़ दिया था
दूर रहके भी तुम मुझे तडपाया करते हो

मेरे ख्वाबों की रानी तू अब भी बनी बैठी

मेरे दीवाने दिल में तू अब भी सजी बैठी
सपनों को तुम ही सजीव बनाया करते हो

रूप सुहाना तेरा मेरे दिल को लुभाता है

पता नहीं मुझको यह कितना सताता है
तन-मन को तुम ही जगमगाया करते हो



स्वरचित अन्तरा- फिल्म शालीमार



हम    बेवफा   हरगिज   न  थे ,पर   हम   वफ़ा   कर   न  सके.   - आनंद बख्शी


हमने  भी चाहा,तुमने भी चाहा,पर   एक  अपनी   चाह  न  थी
हम भी चले थे, तुम भी चले थे,पर   एक   अपनी   राह  न  थी
दिल से  दीवाने  हो के  भी  हम,दिल  में   जगह   कर   न  सके ।  - प्रेम फ़र्रुखाबादी 

हम    बेवफा   हरगिज   न  थे,पर   हम   वफ़ा   कर   न  सके.   - आनंद बख्शी


स्वरचित अन्तरा मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा



मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा , मैं  नागन तू  सपेरा 
जनम जनम का तेरा मेरा बैर, ओ रब्बा खैर,
मैं  नागन  तू  सपेरा                                                            -  आनंद बक्शी 

आज तो  बदला  मैं बस लूंगी,छेड़ न   मुझको  मैं डस  लूंगी 
जंतर     जंतर    जादू    टोने, ये   तो   मेरे   खेल   खिलौने 
मुझ पर  चलेगा  न जोर तेरा, मैं       नागन      तू      सपेरा  
मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा,मैं       नागन      तू     सपेरा   

इस घर से  क्या मेरा रिश्ता ,तू क्या जाने क्या है किस्सा 
इस  घर  में   है  मेरा  साथी ,साथी   है   वो  जीवन  साथी
जा, चला  जा, ना  डाल  डेरा  मैं       नागन      तू      सपेरा     -  प्रेम फ़र्रुखाबादी 
मैं तेरी दुश्मन दुश्मन तू मेरा,मैं       नागन      तू     सपेरा   

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

हम तुम दोनों ही अब दूर न रह पाएं



हम   तुम  दोनों  ही   अब   दूर   न   रह   पाएं 

दूरी   को   देर   तलक  मजबूर   न  सह  पाएं
तुमने   ये   मान   लिया   हमने   ये   मानी है  ( स्वरचित -प्रेम फ़र्रुखाबादी )
जिंदगी और कुछ भी नहीं  तेरी मेरी कहानी है.  - संतोषानंद

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

स्वरचित अन्तरा- फिल्म- शोर


 स्वरचित फ़िल्मी अन्तरा 

हम   ने    तुम्हें    देखा   है 
तुम   ने    हमें      देखा   है 
कौन      कहे      किस    से
दिल   किस   ने    फेका  है 
जिसने     भी      फेका    है 
शुरुआत       सुहानी       है     -प्रेम फ़र्रुखाबादी     

                     

जिंदगी और कुछ  भी नहीं 
तेरी      मेरी     कहानी   है 
एक  प्यार   का  नगमा  है 
मौजों      की    रवानी    है      - संतोषानंद


मंगलवार, 14 अक्तूबर 2014

जैसे भी हों हालात, जीना तो पड़ेगा



जैसे भी हों हालात, जीना तो पड़ेगा
गर्मीं हो या बरसात, जीना तो पड़ेगा
ज़रा तकलीफें आयीं तो मरने चल दिए
कैसे हैं ये जज्बात, जीना तो पड़ेगा।

शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

कभी यह दुनियां पसंद आती है तो कभी नापसंद

कभी यह दुनियां पसंद आती है तो कभी नापसंद। कभी यहाँ से जाने को दिल नहीं करता तो कभी दुनियां छोड़ने को दिल करता है।  जब हम किसी प्यार करते हैं तो बहुत प्यारी लगती है जब नफ़रत करते हैं तो बहुत बुरी लगती है।ऐसा इस लिए होता है कि -
१/३ देवता हैं 
१/३ मनुष्य हैं 
१/३ राक्षस हैं
इन तीन तरह के जीवों की उत्पत्ति का कारण यह ब्रह्माण्ड है हर जीव अपने स्वाभाव के बस कार्य करने के लिए बाध्य है इस पर किसी का बस नहीं चलता।  
-प्रेम फ़र्रुखाबादी

मंगलवार, 7 अक्तूबर 2014

एक सुझाव

 एक सुझाव

कवि सम्मेलनों में गर ऐसा हो तो बहुत अच्छा हो.  हर कवि को एक रचना से ज्यादा सुनाने का अवसर नहीं मिलना चाहिए अगर कोई कवि यह  समझता  है कि  वो बेहतर है  तो साबित करे इसका निर्णय सामने बैठे श्रोता करें  कि कौन बेहतरीन है बस इतनी सी बात है सोना अलग होगा ,चांदी अलग और लोहा अलग होगा।
या फिर कोई निर्णायक मंडल हो जो यह निश्चित  नंबर १, नंबर २ और  नंबर ३ कौन हैऐसे बेहतरीन कवि सामने आएंगे।

सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

वरिष्ठ कवि महोदय की युक्ति

                           वरिष्ठ  कवि महोदय की युक्ति

वरिष्ठ कवि वो कहलाते हैं जो किसी कवि सम्मलेन में जाते हैं और थोड़ी देर बाद ही बड़े विनम्र भाव से संचालक महोदय से निवेदन के साथ कहते  हैं  मुझे जल्दी अवसर देने की कृपा करें एक जरूरी काम है वार्ना मेरी इच्छी तो थी कि सभी कवियों को सुनकर ही जाता । आशा है आप सब हमें क्षमा कर देंगे। सचमुच ही हम सब उन्हें क्षमा कर देते हैं और वो अपनी कविता अधिक से अधिक समय सुनकर सुनाकर अपना प्रतीक  चिन्ह  व पारश्रमिक ले जाना नहीं भूलते हैं. धन्य हो  श्रीमान!
जब मैंने जाते हुए कवि से एकांत में पूंछा  तो बोले मैं  एक वरिष्ठ कवि हूँ बहुत देर तक रुकना मेरे सम्मान के खिलाफ है इस लिए जा रहा हूँ।  मैंने यहाँ तक का सफर ऐसे ही तय नहीं किया श्रेष्ठ  कवि बनने के लिए वरिष्ठ  कवियों से यही युक्ति सीखी है । जयहिंद , चलता हूँ क्षमा करें बंधुवर !

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

गुरू बनेगा विश्व का, अपना भारत देश



गुरू     बनेगा    विश्व    का, अपना  भारत देश ।
धीरे    -    धीरे    दे   रहे,   मोदी    यह   सन्देश।।  
मोदी   यह   सन्देश,  ज्ञान    का   फैले   प्रकाश।
जिसकी बदौलत कर सकें, अपना सभी विकास।।  
कहे  'प्रेम'  कविराय,  काम   इस  पर  हुआ शुरू । 
जल्दी   ही  कहलायेगा, भारत  अब  विश्व  गुरू ।।

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

पहनावे में दोष निकालें, वो महिलाओं के दुश्मन हैं



पहनावे में दोष निकालें, वो महिलाओं के दुश्मन हैं
पहनावे ही बस महिलाओं के, होते एक आकर्षण हैं
झूठ नहीं मैं सच कहता हूँ, ये पूंछ लो चाहे किसी से
महिलाओं को देख-देख के, खुश होते सबके मन हैं.
                                   -प्रेम फ़र्रुखाबादी

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

स्वरचित अंतरा / फिल्म शालीमार / रचना- आनंद बक्शी

 स्वरचित अंतरा /
फिल्म शालीमार / रचना- आनंद बक्शी 
आनंद बक्शी जी मेरी प्रेरणा के स्रोत हैं. 

हम बेवफा हरगिज न थे
पर हम वफ़ा कर न सके
हमने जो सपने  कभी देखे  थे मिलके 
सपने    वो    अपने    सब    चूर   हुए 
तुमने भी जिद की हमने भी जिद की 
जिद   में    ही   हम   तुम    दूर    हुए
मिलके    रहें   सारी   उमर
हम ये   दुआ   कर  न सके       -प्रेम फ़र्रुखाबादी
हम बेवफा हरगिज न थे
पर हम वफ़ा कर न सके
हमने   भी   चाहा   तुमने   भी  चाहा 
पर    एक    अपनी    चाह     न   थी 
हम   भी   चले   थे  तुम  भी चले थे
पर     एक    अपनी    राह    न   थी
दिल से दीवाने हो के भी हम 
दिल में  जगह  कर  न  सके    -प्रेम फ़र्रुखाबादी
हम बेवफा हरगिज न थे
पर हम वफ़ा कर न सके 


बुधवार, 20 अगस्त 2014

मैं पिघल जाऊँगा मैं बदल जाऊँगा

मैं पिघल जाऊँगा  मैं  बदल जाऊँगा
जैसा ढ़ालोगी मुझे वैसा ढ़ल जाऊँगा 
देखते  हैं  कौन  किसे  कितना  चाहे
तुम   से  आगे  मैं   निकल  जाऊँगा
यूँ   ही  बस प्यार  मुझे करते  रहना
वरना   तुम  से  मैं   मचल  जाऊँगा
जिऊँगा तुम्हारी  ख़ुशी के वास्ते ही 
मेरे दिलवर तुझको मैं फल जाऊँगा
चाहे  कैसे  भी  दौर   आएं  फ़िर  भी
संभाल के तुझको मैं संभल जाऊँगा
एक  बार पूंछ तो लो खुद से जानम
कि  तुम्हारे  लिये  मैं  चल जाऊँगा
                    
                        - प्रेम फ़र्रुखाबादी

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

किन्तु परन्तु कैसा


स्वरचित अंतरा / फिल्म रोटी कपडा और मकान


अरे हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
अरे हाय हाय हाय मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
हा आ आ आ
कितने सावन बीत गये
कितने सावन बीत गये बैठी हूँ आस लगाये
जिस सावन में मिले सजनवा वो सावन कब आये
कब आये
मधुर मिलन का ये सावन हाथों से निकला जाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
सोच  में डूबी  सोच  रही  हूँ 
कैसी   ये    किस्मत  पायी
दिन का जिसने चैन लिया  
और   रात  की  नींद  उड़ाई                                          स्व रचित अंतरा
समझ समझ कर समझ रही हूँ कुछ भी समझ न आये - प्रेम फ़र्रुखाबादी 
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

मोदी ने गोदी लिया , पूरा भारत देश



मोदी   ने    गोदी   लिया ,   पूरा   भारत    देश।   
अपने  ज्ञान  विवेक  से,  हर  लेंगे   सब  क्लेश।। 
हर लेंगे सब क्लेश ,सुरक्षा चिकित्सा  शिक्षा से।  
जियेगा  जीवन  अब  तो , हर  कोई   इच्छा  से।। 
कहे  ' प्रेम '  कविराय ,  इंतज़ार   करें   विरोधी।  
अपने  किये   वादों  को ,  सिध्द   करेंगे   मोदी।।  
                     -प्रेम फ़र्रुखाबादी 

सोमवार, 23 जून 2014

स्वरचित अंतरा / फिल्म रोटी कपडा और मकान



अरे हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
अरे हाय हाय हाय मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे
मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे
मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
हा आ आ आ
कितने सावन बीत गये
कितने सावन बीत गये
बैठी हूँ आस लगाये
जिस सावन में मिले सजनवा
वो सावन कब आये
कब आये
मधुर मिलन का ये सावन
हाथों से निकला जाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे
मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे
मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
सोच में  डूबी  सोच रही  हूँ कैसी  ये  किस्मत पायी 
दिन का जिसने चैन लिया 
और रात की नींद उड़ाई     
समझ समझ कर समझ रही हूँ
कुछ भी समझ न आये   स्व रचित अंतरा - प्रेम फ़र्रुखाबादी 
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे
मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी



शनिवार, 21 जून 2014

फिल्म- बैराग- गीतकार - आनंद बक्शी

 फिल्म- बैराग- गीतकार  - आनंद बक्शी

छोटी सी उमर में लग गया रोग
कहते हैं लोग मैं मर जाउँगी
हो मैं मर जाउँगी ) -२

पर मरने से पहले, कुछ करने से पहले
ले के तेरा नाम
तुझे बदनाम
मैं कर जाऊँगी हो मैं मर जाऊँगी

हो
हो
( येहे किसी सहरी छोरी की
प्रीत नहीं है बाबू ) -२
एक बन्जारन केह मतवारे
नैनोंओह का है जादू
तू न जा मेरी मुसकान पे
खेल जाऊँगी मैं जी-जान पे
छोड़ूँगी ना साथ -२
ऐसी क्या है बात
के मैं डर जाऊँगी

हो मैं मर जाऊँगी
 हो
हो
( कब तलक रोकेगा मेरा
रस्ता लाज का पहरा ) -२
याद ये रखना तू सजना
ये मेरा वादा ठहरा
बाबुल की गलियाँ छोड़ के
आऊँगी चुनरिया ओढ़ के
लइके उमंग -२
सैंयाँ तेरे संग
तेरे घर जाऊँगी

हो मैं मर जाऊँगी
हो 
हो 
( जिसने प्यार किया ही नहीं
वो क्या समझे प्यार )-२ 
प्यार बिना ये जीवन जीना 
सचमुच  है बेकार
नैनों से नैन मिले ऐसे  
दिल में फूल खिले जैसे 
प्यार का नशा -२ 
कुछ ऐसा चढ़ा 
मैं तर जाऊँगी           स्वरचित अंतरा -प्रेम फ़र्रुखाबादी

हो मैं मर जाऊँगी

रविवार, 25 मई 2014

सोमवार, 12 मई 2014

बुधवार, 19 मार्च 2014

स्वरचित अंतरा फ़िल्म - अनुराग

फ़िल्म - अनुराग

र : ओ तेरे नैनों के मैं दीप जलाऊँगा
अपनी आँखों से दुनिया दिखलाऊँगा
तेरे नैनों के ...

ल : अच्छा
वो क्या है
र : एक मन्दिर है
ल : उस मन्दिर में
र : एक मूरत है
ल : ये मूरत कैसी होती है
र : तेरी सूरत जैसी होती है
ल : वो क्या है

मैं क्या जानूँ छाँव है क्या और धूप है क्या
रंग-बिरंगी इस दुनिया का रूप है क्या
वो क्या है
र : एक पर्वत है
ल : उस पर्वत पे
र : एक बादल है
ल : ये बादल कैसा होता है
र : तेरे आँचल जैसा होता है
ल : वो क्या है ( गीत कर -आनंद बक्शी )

 लड़का- प्यार बिना जग सूना, कह गए लोग पुराने
            प्यार की भाषा को तो, बस पागल प्रेमी जाने 
लड़की- अच्छा
लड़का- हाँ 
लड़की-  वो क्या है 
लड़का- एक रस्ता है 
लड़की - रस्ते पे 
लड़का - दो प्रेमी हैं
लड़की-  ये प्रेमी  कैसे होते हैं 
लड़का - तेरे- मेरे जैसे होते हैं 
लड़की- वो क्या है  
लड़का- एक रस्ता है (स्वरचित -प्रेम फ़र्रुखाबादी )

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

वो बात मेरे दिल कि मानते तो बात थी



वो बात, मेरे दिल की,मानते  तो बात थी 
क्या मुझपे गुजर रही,जानते तो बात थी.

गुजर जाती जिंदगी ,अपनी बड़े प्यार से 

प्यार अपना दिल से, छानते तो बात थी.

कुछ कहते सुनते हम, बैठते कहीं अकेले

तम्बू  प्यार का दोनों, तानते तो बात थी.

कभी हम ने गौर ही, नहीं किया  दिलवर 

गर एक- दूजे को, पहिचानते तो बात थी.

एक- दूजे को पाके सफल जरूर होते प्रेम 
दोनों अपने दिलों में, ठानते  तो बात थी.

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

आखिर मोहब्बत को क्यों समझेगा जमाना



वो बात मेरे दिल की मानते  तो बात थी 
क्या गुजर रही है ये जानते  तो बात थी. 

गुजर जाती जिंदगी अपनी बड़े प्यार से 

प्यार अपना दिल से छानते तो बात थी.

कुछ कहते सुनते हम बैठते कहीं अकेले

तम्बू  प्यार का दोनों तानते तो बात थी.

कभी हम ने गौर ही नहीं किया  दिलवर 

गर एक दूजे को पहिचानते तो बात थी.

एक दूजे को पाके हम सफल जरूर होते 

दोनों अपने दिलों में ठानते  तो बात थी.

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

न जियें और न जीने दें जहाँ वाले


 
न जियें और न जीने दें जहाँ वाले। 
खुदा क्यों भेजे दुश्मने जाँ वाले। 

दिनों दिन बदलता जा रहा है वक्त
पुरानी सोचें अब तो बेकार हो गयीं।
जिन्दगी दो मौत ना दो औलादों को
बहुतों की जिन्दगीं निसार हो गयीं।

तुम्हारी ही  औलादें है ऐ जहांवालो
जिद में अरमानें तार-तार हो गयीं।
प्यार गर करते हैं तो करने दीजिये 
तुम से ये  कितनी लाचार हो गयीं।

बच्चों के प्यार को समझो प्यार से
झूठी शान पर आखिर क्यों अड़े हो
तुम्हारा अपना खून है गैर का नहीं 
उनको मारो मत तुम उनसे बड़े हो


जाने कब से दुनिया यह चल रही है



जाने
कब से दुनिया यह चल रही है
आने -जाने वालों से यह पल रही है

जाने कितने रूपों से गुजरी है यह 

गिर गिरके उठ उठके संभल रही है।

कोई दुखी तो कोई सुखी नज़र आये  

कहीं बुझ रही है तो कहीं जल रही है

जो
आज दिख रही वो कल रहेगी
रोज़  नए सांचे  में प्यारे ढल रही है

जिसके जैसे  कर्म उसे
यह वैसी लगे
किसी को फले किसी को खल रही है



तेरी कसम तेरे सिवा किसी की आरजू नहीं है


तेरी कसम तेरे सिवा किसी की आरजू नहीं है
तुम हो तो फिर मुझे किसी की जुस्तजू नहीं है

तुम हो आज़ाद कुछ भी सोच सकती हो
किसी को अपना कर भी छोड़ सकती हो 
तुम हो मेरी जान यूँ ही तुमसे गुफ्तगू नहीं है

तुम क्या जानो तुझको कितना चाहूँ मैं  
हर वक्त प्रिये तुझको कितना सराहूँ मैं 
तुमसे बढ़ के जानम सचमुच कोई और नहीं है

तेरे बिना जीना मुझको कबूल होगा
तेरी जुदाई जैसा शूल कोई शूल होगा
तुझसे ही कायम किसी से कायम आबरू नहीं है


आम आदमी पार्टी

    
          आम आदमी पार्टी 

आपने साल  भर में ही  में रंग अपना जमाया है
समझते ही नहीं थे जो समझ में उनकी आया है. 
व्यवस्था  भी  बदल देंगे  अवस्था भी बदल देंगे 
अभी तो पहला ही पहला कदम अपना उठाया है. 
                        
न  भ्रष्टाचार  होगा अब  न होगी  कोई  मंहगाई
आपने  आपकी  खातिर कसम ये सोचकर खाई.
झाड़ू  हमने उठाया है  सफाई होके ही रहेगी अब
इसी  में  ही दिखे  अब  तो  हमें  सब की  भलाई.

                     - प्रेम फ़र्रुखाबादी

वो खुदको खुदा तो वो खुदको खुदी समझती है


वो खुदको खुदा तो वो खुदको खुदी समझती है।
इसलिए दोनों की आपस में कभी नहीं पटती है।  

एक पूरब को तो एक पश्चिम को जाने लगता  
जब भी कभी उनमें कोई अपनी बात चलती है।

जुदाई एक दूजे की कभी गंवारा ही नहीं उनको
इधर वो हाथ मलता तो उधर वो हाथ मलती है। 

कोई बताये दोनों की निभे तो भला कैसे निभे
न वो कभी झुकता दोस्तों न वो कभी झुकती है।