गुरुवार, 3 जून 2010

बेसहारा हूँ प्रिये मुझे अपना सहारा दे दो


बेसहारा
हूँ प्रिये मुझे अपना सहारा दे दो
नज़र मिलाकर मुझे अपना नज़ारा दे दो

ये जिन्दगी इतराने लगे अपने आप पर
चाहत का हँसीं मुझे अपना इशारा दे दो

बगैर तेरे ये जिन्दगी जीना बड़ा मुश्किल
मुहब्बत से भरा मुझे अपना फुहारा दे दो

तड़पके जी तो जाऊँगा ये जिन्दगी मगर
साथ रहके मेरे
मुझे नेक सा गुजारा दे दो

जिन्दगी ये मेरी बस मस्त मस्त हो जाये
दिल को दे सकून
मुझे अपना शरारा दे दो

3 टिप्‍पणियां:

  1. बेसहारा हूँ प्रिये मुझे अपना सहारा दे दो।
    नज़र मिलाकर मुझे अपना नज़ारा दे दो।

    बहुत सुन्दर रचना!
    राम-राम!

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  2. 'ये जिन्दगी इतराने लगे अपने आप पर
    चाहत का हँसीं मुझे अपना इशारा दे दो।'

    - सुन्दर.

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