मंगलवार, 21 जून 2016

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ ,तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ


तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ ,तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 


उठते बैठते चलते फिरते, तुझको ही बस सोचूँ 

कुछ कुछ होने लगता मन में,मन को कैसे रोकूँ 
बंद हो या खुली आँख हो,देखूँ तेरे ही नज़ारे
तेरे नज़ारे मुझको लगते, अपनी जां  से प्यारे 

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ, तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 


समझाने वाले समझाते,पर कुछ भी समझ न आये 

कैसे मिले सकून मुझे, यह कोई नहीं बताये 
अपनी अपनी कह के, सारे चले जाते हैं  
और हम बैठे बैठे अपने, हाथ मले जाते हैं 

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ ,तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 


प्रीति का दीप जलाकर तूने, मुझमें किया उजाला   

मस्ती में भर दिया है तूने, मेरे मन का प्याला 
तेरी कसम अकेले प्याला, मुझसे पिया न जाये 
किसी तरह भी बिन तेरे, मुझसे जिया न जाए 

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 


1 टिप्पणी: