शुक्रवार, 27 मई 2016

कौन नहीं चित्त हुआ हुश्न की मार से.


कौन नहीं चित्त हुआ हुश्न की मार से 
यह सच है तुम पूंछ लो किन्ही चार से

गधा बना ही दिया जब इश्क ने यारो  
तो कैसा डरना अब किसी भी भार से

भला कौन बच पाया यहाँ बचने पर भी 
कट ही जाए कोई आखिर तेज़ धार से

जिंदगी यही हैं जो जी रहे हैं हम सभी
क्या फर्क पड़े इस पार से उस पार से 

जियो जिंदगी आप की है गैर की नहीं
चले जायेंगे सभी एक दिन संसार से।

आना जाना ' प्रेम 'दस्तूर है कुदरत का
फिर रुके कौन यहाँ किस अधिकार से।


2 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम जी आपकी इस कविता ने मन प्रसन्न कर दिया एक तरफ़ से यह पागलपन भी है और एक प्रकार का जुनून भी है इससे कोई बच नही सका आप इसी तरह से आगे भी सुन्दर पंक्तियों से सुशोभित करते रहे और आप इस तरह की रचनाएं शब्द्नगरी पर भी प्रकाशित कर सकते हैं .........

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  2. प्रेम जी आपने बहुत ही सुन्दर तरीके से ये कविता प्रस्तुत की, सुंदरता की चमक से कोई बच नही पाया सब किसी की हुस्न के पीछे पागल हैं आप एसी रचनाओं को शब्दनगरी पर भी प्रकाशित कर सकते हैं जिससे यह और भी लोगो तक पहुँच सके .........




    प्रेम जी आपने बहुत ही सुन्दर तरीके से ये कविता प्रस्तुत की, सुंदरता की चमक से कोई बच नही पाया सब किसी की हुस्न के पीछे पागल हैं आप एसी रचनाओं को शब्दनगरी पर भी प्रकाशित कर सकते हैं जिससे यह और भी लोगो तक पहुँच सके .........





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