गुरुवार, 15 जून 2017

न जाने फेसबुक वो क्यों, छोड़ कर चले गए


न जाने वो फेसबुक क्यों, छोड़ कर चले गए।
दिल अपने दीवाने का क्यों, तोड़ कर चले गए।। दिल खूब बहलता था मेरा देख-देख कर उन्हें, दिल बड़ी बेदर्दी से क्यों, झकझोड़ कर चले गए।।
अब और जीने की कोई अरमान न रही बाकी, खता बताते अपना मुख क्यों, मोड़ कर चले गए।।
ग़मों के सहारे बेखबर जिए जा रहा था जिंदगी, खुशियों से मेरा रिश्ता क्यों, जोड़ कर चले गए।। वो थे तो खूब दिखते थे दोनों ही जहाँ मुझको, रौशनी लेकर आखों को क्यों,फोड़ कर चले गए।।
-प्रेम फ़र्रुखाबादी

मंगलवार, 13 जून 2017

आप से क्या मिला साहिब


आप से क्या मिला साहिब।
 दूर हुआ हर गिला साहिब।। 

मत पूछियेगा हाल दिल का  
गुलाब जैसा खिला साहिब।।

अपना मिलन है कमाल का।  
क्या दिया है सिला साहिब।। 

थम जाए बस वक्त यहीं। 
यूं फले सिलसिला साहिब।।

गुरुवार, 8 जून 2017

चाहने वालों की यहाँ कमी नहीं है

चाहने वालों की यहाँ कमी  नहीं है.
मगर उनकी आखों में नमी नहीं है.

लाख ठुकराए दुनियां प्रेम दीवानों को, 

मगर उनकी गिनती कभी थमी नहीं है.

भले ही कही हो आपने  दिल से,
मगर बात आप की जमी नहीं है.

कहने को बहुत खूबसूरत है दुनिया,

मगर तबियत मेरी कहीं रमी नहीं है. 

सोमवार, 5 जून 2017

तुम हुए मुझ पर फ़िदा क्यों


तुम हुए मुझ पर फ़िदा क्यों, यह तुम जानो। 
फूल तेरे दिल का खिला क्यों, यह तुम जानो।। 
शिकायत भरी नज़रों से देखते रहते हो मुझे। 
करते रहते सबसे गिला क्यों, यह तुम जानो।।