गुरुवार, 28 जुलाई 2016

फिल्म - कोरा कागज स्वरचित अन्तरा


फिल्म - कोरा  कागज 
स्वरचित अन्तरा 

जाएँ तो जाएँ कहाँ सूझे न राह कोई 
न यहाँ की न वहाँ की मुझे न चाह कोई 
कहने को जिन्दा हूँ लेकिन मर के रह गया.  - प्रेम फ़र्रुखाबादी 

मेरा जीवन कोर कागज कोरा ही रह गया 
जो लिखाथा आंसुओं के संग बह गया 

फिल्म - कोरा कागज 
स्वरचित अन्तरा 

जाने क्यों कोई मुझे भाने लगा है 
सपनो में भी रोज आने लगा है 
चाहे दिन हो या रैना 
छीन लिया दिल का चैना    - प्रेम फ़र्रुखाबादी 

कोई ये तो बतादे मुझे वो 
तो नहीं हो गया मुझे वो  
मेरा पढ़ने में नहि  लागे  दिल   
दिल पे क्या पडि गयी मुश्किल 

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