गुरुवार, 2 जून 2016

हम कहाँ से आते हैं , हम कहाँ को जाते हैं


हम कहाँ से आते हैं , हम कहाँ को जाते हैं 
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

प्रभु के घर से हम आये, प्रभु के घर ही जाएँ 
संत हमारे हम को अक्सर, बात यही बतलाएं 
प्रभु के घर में खुले हुए, हम सब के खाते  हैं।  
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

कोई न जाने दुनियां में, आखिर क्यों हम आये 
आने जाने का भेद अभी तक, हम जान नहीं पाये 
क्या करने को आते हैं, क्या करके जाते हैं।  
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

क्यों भेजा हमें दुनियां में, क्या थी प्रभु की इच्छा 
प्रभु इच्छा में छुपी हुई हो, शायद कोई शिक्षा 
कुछ तो मतलब होगा, जो हम को भटकाते हैं।  
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

जितने मुंह हैं उतनी बातें, पर कोई नहीं यह जाने 
जिसको जितना पता है,उतना ही वो ताने 
प्रभु की लीला प्रभु जाने, हम जान न पाते हैं।  
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

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