बुधवार, 22 जून 2016

क्यों अपना समझ बैठे जमाने को हम


क्यों अपना समझ बैठे, जमाने को हम.
क्या कर बैठे खुद को, बहलाने को हम. 

जो मेरा ख्याल ही नहीं रखता बिल्कुल
दिल दे बैठे अपना ऐसे दीवाने को हम.

जिसको सुनने को यहाँ कोई तैयार नहीं
फिर क्यों संभालें ऐसे अफ़साने को हम.

उसकी तलब ने मुझे दीवाना बना दिया
इतने बेक़रार हुए बैठे उसे पाने को हम. 

मंगलवार, 21 जून 2016

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ ,तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ


तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ ,तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 


उठते बैठते चलते फिरते, तुझको ही बस सोचूँ 

कुछ कुछ होने लगता मन में,मन को कैसे रोकूँ 
बंद हो या खुली आँख हो,देखूँ तेरे ही नज़ारे
तेरे नज़ारे मुझको लगते, अपनी जां  से प्यारे 

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ, तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 


समझाने वाले समझाते,पर कुछ भी समझ न आये 

कैसे मिले सकून मुझे, यह कोई नहीं बताये 
अपनी अपनी कह के, सारे चले जाते हैं  
और हम बैठे बैठे अपने, हाथ मले जाते हैं 

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ ,तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 


प्रीति का दीप जलाकर तूने, मुझमें किया उजाला   

मस्ती में भर दिया है तूने, मेरे मन का प्याला 
तेरी कसम अकेले प्याला, मुझसे पिया न जाये 
किसी तरह भी बिन तेरे, मुझसे जिया न जाए 

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 


गुरुवार, 2 जून 2016

हम कहाँ से आते हैं , हम कहाँ को जाते हैं


हम कहाँ से आते हैं , हम कहाँ को जाते हैं 
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

प्रभु के घर से हम आये, प्रभु के घर ही जाएँ 
संत हमारे हम को अक्सर, बात यही बतलाएं 
प्रभु के घर में खुले हुए, हम सब के खाते  हैं।  
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

कोई न जाने दुनियां में, आखिर क्यों हम आये 
आने जाने का भेद अभी तक, हम जान नहीं पाये 
क्या करने को आते हैं, क्या करके जाते हैं।  
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

क्यों भेजा हमें दुनियां में, क्या थी प्रभु की इच्छा 
प्रभु इच्छा में छुपी हुई हो, शायद कोई शिक्षा 
कुछ तो मतलब होगा, जो हम को भटकाते हैं।  
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

जितने मुंह हैं उतनी बातें, पर कोई नहीं यह जाने 
जिसको जितना पता है,उतना ही वो ताने 
प्रभु की लीला प्रभु जाने, हम जान न पाते हैं।  
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

जैसी मिले जिंदगी वैसी जीते चले जाएँ


मन की जिंदगी किसको मिली यहाँ
जिसको मिली यहाँ खुश वो भी नहीं यहाँ

जैसी मिले जिंदगी वैसी जीते चले जाएँ
कभी खुद का गम कभी जग का गम पीते चले जाएँ
जैसी मिले जिंदगी वैसी जीते चले जाएँ।

एक नहीं कई एक मिलेंगे दिल को दुखाने वाले
झुकने वाले नहीं मिलेंगे मिलेंगे झुकाने वाले
चाक गिरेबां हो जाए तो सीते चले जाएँ।
जैसी मिले जिंदगी वैसी जीते चले जाएँ

साथ नहीं कोई देता है देखो प्यारे यहाँ
कहने को सब साथी है देखो सारे यहाँ
अपनी दम पर अपनी साँसे खींचे चले जाएँ।
जैसी मिले जिंदगी वैसी जीते चले जाएँ

उतना इकठ्ठा करो कि यह जिंदगी चलती रहे
प्यार मुहब्बत से रह कर हर ख़ुशी मिलती रहे 
रीते ही हम आये हैं रीते चले जाएँ।
जैसी मिले जिंदगी वैसी जीते चले जाएँ
                              - प्रेम फ़र्रुखाबादी