शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

यह जीवन जीना आसान नहीं


यह  जीवन  जीना  आसान नहीं 
है  कौन  यहाँ  जो  परेशान नहीं।  

होता  है  दुःख  उसी  को अक्सर 
होता  जिसको  कोई  ज्ञान  नहीं।  

जो अपनी  ही  परवाह  करे बस 
वो  पशु  है  कोई   इंसान   नहीं।  

बस  वही  भटकता रह  जाता है 
आता जिसको यहाँ ध्यान  नहीं।   

किया नहीं  कोई परहित जिसने
कभी होता उसका कल्याण नहीं।   

जो बिना  बुलाये  पहुँच जाता है 
कभी होता उसका सम्मान नहीं। 

प्रभु चरणों  के ध्यान  के आगे  
होता कोई हित कर ध्यान नहीं। 


मंगलवार, 6 सितंबर 2016

तेरे प्यार में गिरा गया हूँ उठाले मुझको


तेरे प्यार में गिरा गया हूँ उठाले मुझको, 
दे कर अपनी मुहब्बत के उजाले मुझको। 

खुद को संभालते संभालते थक गया हूँ मैं, 
अब कोई तो आये और आके संभाले मुझको। 

बिना किसी को अपना बनाये कोई जिए कैसे 
मैं कोई बुरा तो नहीं अपना बनाले मुझको। 

तैयार हूँ किसी को अपना बनाने के लिए, 
दिल से निभा दूंगा कोई अपनाले मुझको। 

चुस्त दुरस्त मस्त दिल वाले की तलाश है, 
पसंद ही नहीं आते लोग ढीले ढाले मुझको। 

जब भी बुलाओगे पास दौड़ा चला आऊंगा, 
या फिर तू ही कभी पास बुलाले मुझको। 

किस्मत मेरी बंद पड़ी हुई तालों में यारो, 
चाबी लिए घूम रहा मिलते नहीं ताले मुझको। 

"कंधे पर लाश"


    
 " कंधे पर लाश " 

इंसान ने इंसान का साथ छोड़ दिया है                                           
बेशर्मी से उसने अपना मुख मोड़ लिया है.

इंसान को इंसान कहने में अब शर्म आये 
हैवानियत से उसने अपना नाता जोड़ लिया है. 

ऐसा किसी के साथ न हो जमीन पर 
जिसने भी देखा उनको झकझोड़ दिया है. 

इतनी गिर जाएगी इंसानियत मालूम न था 
खुदगर्जी ने इंसान को इंसान से तोड़ दिया है. 

सोमवार, 5 सितंबर 2016

कब देगा तू मेरा साथ,



एक पत्नी अपने पति से कितनी पीड़ित है. 
अपनी पीड़ा के साथ-साथ वह अपने गुस्से
का भी बयान इस गीत के माध्यम से इस प्रकट कर रही है-

कब देगा तू मेरा साथ,
कब मानेगा मेरी बात
दिन तो जैसे तैसे कटे,
कटती नहीं है मेरी रात ।
दिन तो जैसे तैसे कटे...

दिखने में लगता है भोला,
जब बोला झूठ ही बोला
देख ली तेरी क्या औकात।
दिन तो जैसे तैसे कटे... 

अंदर से तू है शातिर,
समझ गयी हूँ मैं आखिर
नरक बना दिए हैं हालात।
दिन तो जैसे तैसे कटे...

मुझे कभी समझा ही नहीं,
माना कभी अपना ही नहीं
कभी समझे नहीं मेरे जज्बात।
दिन तो जैसे तैसे कटे...

सपने मेरे सब चूर हुए,
मरने को मजबूर हुए
दुःख में डूबे हैं दिन रात।
दिन तो जैसे तैसे कटे...






     


बुधवार, 31 अगस्त 2016

स्वरचित अन्तरा- फिल्म- 'राम तेरी गंगा मैली


 फिल्म- 'राम तेरी गंगा मैली'  गीतकार - रविन्द्र जैन 
 स्वरचित अन्तरा - प्रेम फर्रुखाबादी 

एक राधा  एक मीरा  दोनों ने श्याम को चाहा  
अंतर क्या दोनों की  चाह में बोलो  
एक प्रेम दीवानी एक दरस दीवानी           -रविन्द्र जैन 

अपनी अपनी धुनि  में डूबी दोनों ही बेसुध होकर
मन मोहन की शरण हुई वो खुद ही खुद में खोकर 
एक तन से एक मन से, पाया दोनों ने जतन  से 
अंतर क्या दोनों की लगन में बोलो  
एक सजन रिझानी  एक भजन रिझानी          - प्रेम फर्रुखाबादी 

एक राधा  एक मीरा  दोनों ने श्याम को चाहा  
अंतर क्या दोनों की  चाह में बोलो  
एक प्रेम दीवानी एक दरस दीवानी           -रविन्द्र जैन 

बुधवार, 10 अगस्त 2016

स्वरचित अन्तरा / फिल्म हमराज़ /तुम अगर साथ देने का वादा करो


तुम रहो प्यार से हम रहें प्यार से  
प्यार से हम बचें वक्त की मार से 
प्यार में तुम मुझे यूँ डुबोती रहो  
प्यार में मैं तुम्हें यूँ डूबाता रहूँ       -प्रेम फर्रुखाबादी 
तुम अगर साथ देने का वादा करो 
मैं यूँ ही मस्त नग्में सुनाता रहूँ
 

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

ऐसा नहीं कि हम कुछ समझते नहीं


ऐसा नहीं कि हम कुछ समझते नहीं
समझते तो बहुत हैं मगर कहते नहीं।
कहने से क्या इन्सां बुरा मान जाता है
बुरा मान जाये कोई हमें नहीं भाता है।  

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

स्वरचित अन्तरा - फिल्म -समझौता


स्वरचित अन्तरा - फिल्म -समझौता 

हार मिलेगी, जीत मिलेगी 
कभी नफ़रत तो, कभी प्रीत मिलेगी 
अलग अलग है रीत यहाँ 
अलग ही, रीत मिलेगी -२     -प्रेम फ़र्रुखाबादी 

समझौता ग़मों से कर लो 
जिंदगी में गम भी मिलते हैं.

स्वरचित अन्तरा - फिल्म -समझौता 

नफ़रत  से नफरत को, भगा न सका कोई 
इस सच को झूठ यहाँ, बता न सका कोई 
हम प्यार से-३  प्यार जगाये हैं,             -प्रेम फ़र्रुखाबादी 
प्यार का तोहफा लाये हैं 
बड़ी दूर से आये हैं, प्यार का तोहफा लाये हैं. 

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

फिल्म - कोरा कागज स्वरचित अन्तरा


फिल्म - कोरा  कागज 
स्वरचित अन्तरा 

जाएँ तो जाएँ कहाँ सूझे न राह कोई 
न यहाँ की न वहाँ की मुझे न चाह कोई 
कहने को जिन्दा हूँ लेकिन मर के रह गया.  - प्रेम फ़र्रुखाबादी 

मेरा जीवन कोर कागज कोरा ही रह गया 
जो लिखाथा आंसुओं के संग बह गया 

फिल्म - कोरा कागज 
स्वरचित अन्तरा 

जाने क्यों कोई मुझे भाने लगा है 
सपनो में भी रोज आने लगा है 
चाहे दिन हो या रैना 
छीन लिया दिल का चैना    - प्रेम फ़र्रुखाबादी 

कोई ये तो बतादे मुझे वो 
तो नहीं हो गया मुझे वो  
मेरा पढ़ने में नहि  लागे  दिल   
दिल पे क्या पडि गयी मुश्किल 

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ ,तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ


 तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ ,तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 

उठते बैठते चलते फिरते, तुझको ही बस सोचूँ 
कुछ कुछ होने लगता मन में,मन को कैसे रोकूँ 
बंद हो या खुली आँख हो,देखूँ तेरे ही नज़ारे
तेरे नज़ारे मुझको लगते, अपनी जां से प्यारे 

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ, तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 

समझाने वाले समझाते,पर कुछ भी समझ न आये 
कैसे मिले सकून मुझे, यह कोई नहीं बताये 
अपनी अपनी कह के, सारे चले जाते हैं 
और हम बैठे बैठे अपने, हाथ मले जाते हैं 

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ ,तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 

प्रीति का दीप जलाकर तूने, मुझमें किया उजाला 
मस्ती में भर दिया है तूने, मेरे मन का प्याला 
तेरी कसम अकेले प्याला, मुझसे पिया न जाये 
किसी तरह भी बिन तेरे, मुझसे जिया न जाए 

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ

हर किसी से दिल लगा नहीं करता


हर किसी से दिल लगा नहीं करता
जिससे लगा करता हटा नहीं करता।

उसको कोई कहे तो भला क्या कहे
जो प्यार से प्यार अदा नहीं करता।

इस दुनियां में ऐसा नहीं दिखा कोई
जो कभी किसी से दगा नहीं करता।

प्यार से ही प्यार पैदा होता अक्सर
प्यार से प्यार कभी घटा नहीं करता।

जो प्यार करता है बस करता ही है
भूल कर भी कभी गिला नहीं करता।

आदमी अपने कर्मों का फल भोगता
उसका खुदा उसका बुरा नहीं करता।

चुपचाप बैठ गया है वो दिल लेकर
वफ़ा के बदले क्यों वफ़ा नहीं करता।  


गरीब घर चलाना जानता है


गरीब घर चलाना जानता है
भूख को मिटाना जानता है.

आज तो है कल नहीं रहेगा
फिर भी निभाना जानता है.

रोने को दिल करता बहुत
गम को छुपाना जानता है.

गरीब का कोई नहीं यहाँ
यह बात जमाना जानता है.

जिए हर हाल में जिंदगी
बुरा वक्त भुलाना जानता है.

रूठ कर क्या बिगाड़ लेगा
खुद को बहलाना जानता है.

चल पड़ा हूँ मुहब्बत की डगर


चल पड़ा हूँ मुहब्बत की डगर
न कुछ पता है न कुछ खबर.

कुछ न पूँछिये दिल का हाल
बहुत खुश है दिल का नगर.

दिल दीवाना हो जा पूरी तरह
अब न रहे कोई कमी कसर.

मुहब्बत का ज्ञान नहीं कोई
बिल्कुल अनारी हूँ मैं बेहुनर.

दिल मेरा करे तो क्या करे
न होती शाम न होती सहर.

चाहे सुबह हो चाहे हो शाम
निकल पड़ता हूँ सज संवर.

भटकता हूँ बादलों की तरह
पैर भी दुःखें और दुखे कमर, 

सोमवार, 11 जुलाई 2016

जैसे तुम ने मुझे छुआ है

ज्यों तुम ने मुझे छुआ है.
दिल में कुछ कुछ हुआ है.
मौसम को देख कर जैसे
पेड़ से कोई आम चुआ है.

बुधवार, 22 जून 2016

क्यों अपना समझ बैठे जमाने को हम


क्यों अपना समझ बैठे, जमाने को हम.
क्या कर बैठे खुद को, बहलाने को हम. 

जो मेरा ख्याल ही नहीं रखता बिल्कुल
दिल दे बैठे अपना ऐसे दीवाने को हम.

जिसको सुनने को यहाँ कोई तैयार नहीं
फिर क्यों संभालें ऐसे अफ़साने को हम.

उसकी तलब ने मुझे दीवाना बना दिया
इतने बेक़रार हुए बैठे उसे पाने को हम. 

मंगलवार, 21 जून 2016

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ ,तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ


तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ ,तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 


उठते बैठते चलते फिरते, तुझको ही बस सोचूँ 

कुछ कुछ होने लगता मन में,मन को कैसे रोकूँ 
बंद हो या खुली आँख हो,देखूँ तेरे ही नज़ारे
तेरे नज़ारे मुझको लगते, अपनी जां  से प्यारे 

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ, तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 


समझाने वाले समझाते,पर कुछ भी समझ न आये 

कैसे मिले सकून मुझे, यह कोई नहीं बताये 
अपनी अपनी कह के, सारे चले जाते हैं  
और हम बैठे बैठे अपने, हाथ मले जाते हैं 

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ ,तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 


प्रीति का दीप जलाकर तूने, मुझमें किया उजाला   

मस्ती में भर दिया है तूने, मेरे मन का प्याला 
तेरी कसम अकेले प्याला, मुझसे पिया न जाये 
किसी तरह भी बिन तेरे, मुझसे जिया न जाए 

तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ तुझे भूलूँ तो कैसे भूलूँ 


गुरुवार, 2 जून 2016

हम कहाँ से आते हैं , हम कहाँ को जाते हैं


हम कहाँ से आते हैं , हम कहाँ को जाते हैं 
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

प्रभु के घर से हम आये, प्रभु के घर ही जाएँ 
संत हमारे हम को अक्सर, बात यही बतलाएं 
प्रभु के घर में खुले हुए, हम सब के खाते  हैं।  
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

कोई न जाने दुनियां में, आखिर क्यों हम आये 
आने जाने का भेद अभी तक, हम जान नहीं पाये 
क्या करने को आते हैं, क्या करके जाते हैं।  
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

क्यों भेजा हमें दुनियां में, क्या थी प्रभु की इच्छा 
प्रभु इच्छा में छुपी हुई हो, शायद कोई शिक्षा 
कुछ तो मतलब होगा, जो हम को भटकाते हैं।  
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

जितने मुंह हैं उतनी बातें, पर कोई नहीं यह जाने 
जिसको जितना पता है,उतना ही वो ताने 
प्रभु की लीला प्रभु जाने, हम जान न पाते हैं।  
समझ समझ कर समझ रहे, पर समझ न पाते हैं 

जैसी मिले जिंदगी वैसी जीते चले जाएँ


मन की जिंदगी किसको मिली यहाँ
जिसको मिली यहाँ खुश वो भी नहीं यहाँ

जैसी मिले जिंदगी वैसी जीते चले जाएँ
कभी खुद का गम कभी जग का गम पीते चले जाएँ
जैसी मिले जिंदगी वैसी जीते चले जाएँ।

एक नहीं कई एक मिलेंगे दिल को दुखाने वाले
झुकने वाले नहीं मिलेंगे मिलेंगे झुकाने वाले
चाक गिरेबां हो जाए तो सीते चले जाएँ।
जैसी मिले जिंदगी वैसी जीते चले जाएँ

साथ नहीं कोई देता है देखो प्यारे यहाँ
कहने को सब साथी है देखो सारे यहाँ
अपनी दम पर अपनी साँसे खींचे चले जाएँ।
जैसी मिले जिंदगी वैसी जीते चले जाएँ

उतना इकठ्ठा करो कि यह जिंदगी चलती रहे
प्यार मुहब्बत से रह कर हर ख़ुशी मिलती रहे 
रीते ही हम आये हैं रीते चले जाएँ।
जैसी मिले जिंदगी वैसी जीते चले जाएँ
                              - प्रेम फ़र्रुखाबादी 

शुक्रवार, 27 मई 2016

कौन नहीं चित्त हुआ हुश्न की मार से.


कौन नहीं चित्त हुआ हुश्न की मार से 
यह सच है तुम पूंछ लो किन्ही चार से

गधा बना ही दिया जब इश्क ने यारो  
तो कैसा डरना अब किसी भी भार से

भला कौन बच पाया यहाँ बचने पर भी 
कट ही जाए कोई आखिर तेज़ धार से

जिंदगी यही हैं जो जी रहे हैं हम सभी
क्या फर्क पड़े इस पार से उस पार से 

जियो जिंदगी आप की है गैर की नहीं
चले जायेंगे सभी एक दिन संसार से।

आना जाना ' प्रेम 'दस्तूर है कुदरत का
फिर रुके कौन यहाँ किस अधिकार से।


यह रेलगाड़ी, यह रेलगाड़ी

यह रेलगाड़ी

     यह रेलगाड़ी   

यह रेलगाड़ी यह रेलगाड़ी                      
यह रेलगाड़ी यह रेलगाड़ी                       
चलके दिखाए चलना सिखाए 
जीवन में आगे बढ़ना सिखाए।
यह रेलगाड़ी यह रेलगाड़ी 
यह रेलगाड़ी यह रेलगाड़ी  

अपने लिए कभी जीती नहीं है 
ऐसी कोई इसकी नीति नहीं है 
पर सेवा में सारा जीवन बिताए। 
यह रेलगाड़ी यह रेलगाड़ी 
यह रेलगाड़ी यह रेलगाड़ी 

गाँव हो या फिर शहर हो भले 
चाहे फिर कोई भी पहर हो भले 
अपने हर साथी को मंजिल पहुंचाए।
यह रेलगाड़ी यह रेलगाड़ी 
यह रेलगाड़ी यह रेलगाड़ी

अपनी ही धुन में रहती है सदा 
ऐसे ही जियो सबसे कहती है सदा 
मस्ती में मस्ती से सीटी बजाये।
यह रेलगाड़ी यह रेलगाड़ी 
यह रेलगाड़ी यह रेलगाड़ी

बैठके अकेले समझो इस का मरम 
इंसानी धर्म है इस का धर्म धरम 
जो भी बैठे उसको दिल में बिठाये। 
यह रेलगाड़ी यह रेलगाड़ी 
यह रेलगाड़ी यह रेलगाड़ी
     -प्रेम फ़र्रुखाबादी 

 



मंगलवार, 1 मार्च 2016

स्वरचित अन्तरा / ओ फिरकी वाली


ओ फिरकी वाली तू कल फिर आना नहीं फिर जाना तू अपनी जुबान से
कि तेरे नैना हैं ज़रा बेईमान से
ओ मतवाली ये दिल क्यों तोड़ा ये तीर काहे छोड़ा नज़र की कमान से
कि मर जाऊँगा मैं बस मुस्कान से
ओ फिरकी वाली ...

पहले भी तूने इक रोज़ ये कहा था -२
आऊँगी तू ना आई
वादा किया था सैंया बन के बदरिया
छाऊँगी तू ना छाई
( मेरे प्यासे ) -२ नैना तरसे तू निकली ना घर से
कैसे बीती वो रात सुहानी तू सुन ले कहानी ये सारे जहान से

कि तेरे नैना हैं ...
सोचा था मैने किसी रोज़ गोरी हँस के -२
बोलेगी तू ना बोली
मेरी मोहब्बत भरी बातें सुन-सुन के
डोलेगी तू ना डोली
( ओ सपनों में ) -२ आने वाली रुक जा जाने वाली 
किया तूने मेरा दिल चोरी ये पूछ ले गोरी ज़मीं आसमान से 
कि तेरे नैना हैं ...                                                           -आनंद बख्शी 
चाह में तेरी मैं तो पागल हुआ हूँ -२ 
देख ले तू देख ले 
फिर भी नहीं मैं तुझको छुआ हूँ 
देख ले तू देख ले 
(लाखों में तू )-२ एक अनोखी  दिल को भाये तेरी शोखी 
कोई झूठ न बोलूं   मैं सच ही बोलूँ कसम ईमान  से          - प्रेम फ़र्रुखाबादी 
कि तेरे नैना हैं ...