शनिवार, 12 दिसंबर 2015

स्वरचित अन्तरा फिल्म - बैराग


फिल्म - बैराग 

रफ़ी: पीते पीते कभी-कभी यूं जाम बदल जाते हैं
जाम बदल जाते हैं - २
अरे काम बदल जाते हैं, लोगों के नाम बदल जाते हैं
रफ़ी: ये परवाना-ए-शमा, मेहमान है इक रात का - २
दिल की बातें छेड़ दूं, डर है बस इस बात का
यहाँ से वहाँ तक जाने में, वहाँ से यहाँ तक आने में
लोग ये कहते हैं जी - २
बंद लिफ़ाफ़े में भी, दिल के पैग़ाम बदल जाते हैं
पीते पीते ...                                          -आनंद बक्शी 

दौलत का ऐसा नशा, सिर पे चढ़ के बोलता 
जिसपे भी चढ़ जाये, पागल बन के डोलता 
कोई झूठ नहीं कहता हूँ मैं,सचमुच ही कहता हूँ मैं 
दौलत की शान ऐसी,परसा से बदले परसी 
परसी से परशुराम बदल जाते हैं    स्वरचित अन्तरा - प्रेम फ़र्रुखाबादी 

पीते पीते ...