बुधवार, 24 जून 2015

स्वरचित अन्तरा -ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मकाम


स्वरचित अन्तरा 
फिल्म -आपकी कसम        गीत कार-  -आनंद बक्शी 

ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मकाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते

फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं
फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं मगर
पतझड़ में जो फूल मुरझा जाते हैं
वो बहारों के आने से खिलते नहीं
कुछ लोग जो सफ़र में बिछड़ जाते हैं
वो हज़ारों के आने से मिलते नहीं
उम्र भर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते
ज़िन्दगी के सफ़र में ...

कौन अपना है, जग सपना  है 
कौन अपना है, जग सपना  है  सुनो 
भरमाता ही रहता है सारी उमर 
जान कर भी कोई जान पाता नहीं 
किसको अपना कहें किसको गैर कहें 
मान कर भी कोई मान पाता नहीं 
इस तरह जी के, चले जाते है, जो अपने धाम   -प्रेम फ़र्रुखाबादी 

वो फिर फिर आते, वो फिर फिर आते 
ज़िन्दगी के सफ़र में ...



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