शनिवार, 22 नवंबर 2014

घर से चली वो जब ही अपने दफ्तर को



घर से चली वो जब ही अपने दफ्तर को
बीच  राह में  बरसो  पानी  बड़ी  जोर है। 
ऊपर  से नीचे तक  भीग गए सारे अंग
सारा  बदन  पानी  में  हुआ  सराबोर है। 
अंग-अंग झलक उठे  मस्ती टपक पड़ी
लोगों की मस्ती का न रहा ओऱ छोर है। 
खुदको ही देख वो लजाई अपने आप में
दबे  पांव  चुप चाप   चली  घर  ओऱ है।
                               -प्रेम फ़र्रुखाबादी

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