सोमवार, 23 जून 2014

स्वरचित अंतरा / फिल्म रोटी कपडा और मकान



अरे हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
अरे हाय हाय हाय मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे
मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे
मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
हा आ आ आ
कितने सावन बीत गये
कितने सावन बीत गये
बैठी हूँ आस लगाये
जिस सावन में मिले सजनवा
वो सावन कब आये
कब आये
मधुर मिलन का ये सावन
हाथों से निकला जाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे
मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे
मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
सोच में  डूबी  सोच रही  हूँ कैसी  ये  किस्मत पायी 
दिन का जिसने चैन लिया 
और रात की नींद उड़ाई     
समझ समझ कर समझ रही हूँ
कुछ भी समझ न आये   स्व रचित अंतरा - प्रेम फ़र्रुखाबादी 
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे
मेरा लाखों का सावन जाये
हाय हाय ये मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी



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