सोमवार, 9 दिसंबर 2013

स्वरचित अंतरा, ज़िंदगी एक नाटक है

 फ़िल्म - नाटक  - गीत कार आनंद बक्शी 

ज़िंदगी एक नाटक है  हम नाटक में काम करते हैं
पर्दा उठते ही पर्दा गिरते ही सबको सलाम  करते हैं 

खेल में कभी बजती हैं तालियां  
और कभी लोग देते हैं गलियां
भले बनते ही, बुरे बनते ही 
अपने नाम बदनाम करते हैं हम नाटक में काम करते हैं.
ज़िंदगी एक नाटक है 
हम नाटक में काम करते हैं

कभी कभी हम ख़ुशी को मनाते 
और  कभी  हम  दुखी  हो  जाते
क्या  कहें  कैसा, यह जहाँ  ऐसा, कभी दाम बिन दाम करते हैं.   (स्वरचित अंतरा - प्रेम फ़र्रुखाबादी)  
हम नाटक में काम करते हैं
ज़िंदगी एक नाटक है 
हम नाटक में काम करते हैं

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार (10-12-2013) को मंगलवारीय चर्चा --1456 कमल से नहीं झाड़ू से पिटे हैं हम में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत खूब प्रेम जी ... ये अंदाज़ भी लाजवाब है आपका ...

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