बुधवार, 15 मई 2013

वफ़ादारी का दरवाजा हुआ बंद है

वफ़ादारी का दरवाजा हुआ बंद है। 
हर कोई आज बना हुआ जयचंद है।   

भाभियाँ तंग है आज कल जिन से 
या तो वो सास या फिर वो नन्द है। 

वही कविता आज कल सराहनीय  
जिन में बिंधा कोई न कोई छंद है।  
 
शरीर अपना यह कुछ नहीं है बस 
आत्मा कैद करने का एक फंद है।  

समझाने से भी जो न समझे सके 
वो उल्लू का पठ्ठा अक्ल का मंद है। 

जहाँ में वो ही जी सकता है दोस्त 
जिसका हौसला एक दम बुलंद है। 

मान मिले न मिले पर दाम मिले 
लालची तब ही होता रजामंद है। 

गुलाम कोई नहीं है तो बना डालो 
गुलाम आज कल सबकी पसंद है।