शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

छोड़ें अपने बैर को, माँगें सबकी खैर को


छोड़ें अपने बैर को, माँगें  सबकी खैर को
आओ मिलकर, हमदम, हमदम, हमदम 
सोचें समझें,सोचें समझें,सोचें समझें,हम 
खुशियाँ  लुटाके, अपना लेंगे, सबके गम
छोड़ें अपने बैर को...

बेहतर से बेहतर, हम काम करेंगे
काम से ही अपने, हम नाम करेंगे
देखेंगे,  एक  दूजे  में  ना,  कोई  ख़म। 
खुशियाँ  लुटाके, अपना लेंगे,सबके गम
छोड़ें अपने बैर को...

आपस में हम सब, मिलके रहेंगे 
फ़ूलों की तरह हम, खिलके रहेंगे   
चाहे,  लगाना  पड़े, कितना भी, दम।
खुशियाँ लुटाके, अपना लेंगे, सबके गम
छोड़ें अपने बैर को...

मंदिर में बैठकर हम, ध्यान करेंगे  
नारी का समाज में, सम्मान करेंगे  
इंसानियत का,मिलके,निभा देंगे, धरम। 
खुशियाँ लुटाके, अपना लेंगे, सबके गम 
छोड़ें अपने बैर को...

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