शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

दिल चुराकर नज़र चुराना ......



दिल  चुरा कर  नज़र चुराना,  ठीक नहीं होता। 
अपना बना कर फिर सताना, ठीक नहीं होता। 

निभा  सको जितने  उतने, वादे करना सीखो 
वादा  करके  मुकर  जाना,  ठीक  नहीं  होता।

दूर  रहना ही था तो  क्यों,  नज़दीक  में आये 
नज़दीक आकर  दूर जाना,  ठीक  नहीं होता।  

हँसा-हँसा कर दुनियां को, प्रेम पुण्य  कमाओ 
रुला रुला कर  पाप  कमाना, ठीक नहीं होता। 

                                     

1 टिप्पणी:



  1. ♥(¯`'•.¸(¯`•*♥♥*•¯)¸.•'´¯)♥
    ♥♥नव वर्ष मंगलमय हो !♥♥
    ♥(_¸.•'´(_•*♥♥*•_)`'• .¸_)♥



    दिल चुराकर नज़र चुराना ठीक नहीं होता।
    अपना बनाकर फिर सताना ठीक नहीं होता।


    कहा तो आपने सही है ...
    वाह ! वाऽह !
    क्या बात है !
    आदरणीय प्रेम फर्रुखाबादी जी
    सुंदर रचना के लिए बधाई !


    मकर संक्रांति की अग्रिम शुभकामनाओं सहित…

    राजेन्द्र स्वर्णकार
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