शनिवार, 22 सितंबर 2012

स्वरचित अन्तरा,तेरे नाम के सिवा कुछ याद नहीं



तेरे नाम के सिवा कुछ  याद नहीं  
मुझे क्या हो गया  कुछ याद नहीं  
( फिल्म -अलग अलग  गीत आनंद बक्षी) 

उठते बैठते चलते फिरते 
तुझको ही बस सोचूँ 
कुछ कुछ होने लगता मन में 
मन को कैसे रोकूँ 
बंद हो या  खुली आँख हो 
देखूं तेरे ही नज़ारे 
तेरे नज़ारे लगते मुझको 
अपनी जां से प्यारे . (स्वरचित अन्तरा  प्रेम फर्रुखाबादी )    

तेरे नाम के सिवा कुछ  याद नहीं  
मुझे क्या हो गया  कुछ याद नहीं  

5 टिप्‍पणियां:


  1. टाइप पोस्ट होता तो जल्दी साफ़ नज़र आता है ..
    खैर पढ़कर बहुत अच्छा लगा
    बढ़िया प्रस्तुति

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  2. प्रेम जी एक लोकप्रिय गीत पर आपके रचनात्मक विस्तार ने सोच की नयी राह खोली है ......प्रस्तुति का शुक्रिया!

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  3. बहुत ही सुंदर रचना है , बधाई |

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  4. बड़ी भावपूर्ण पंक्तियाँ हैं.

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