मंगलवार, 22 मई 2012

जो नहीं हो वो ही सबको बताते क्यों हो




जो नहीं हो वो ही, सब को बताते क्यों हो।

खुद की नज़र में खुद को, गिराते क्यों हो।



जो मिलना होगा, मिल जायेगा वक्त पर।


वक्त से पहले आखिर, छटपटाते क्यों हो।



असफल तुम ही नहीं, बहुत हुए हैं जहाँ में


असफलता ,पर  दुःख को, मनाते क्यों हो।



हार जीत सुख- दु ख, ये राही हैं जीवन के


इन से हौसला लो खुद को, रुलाते क्यों हो।



तुम्हारे सिवा, तुम्हारे साथ, कोई नहीं प्रेम 


लड़िये जंग खुद को, बेदम बनाते क्यों हो।






6 टिप्‍पणियां:

  1. असफल तुम्हीं नहीं बहुत हुए हैं जहाँ में
    असफलता पर दुःख को मनाते क्यों हो ...

    सही कहा है ... ये तो लगा रहता है जीवन में ... असफलता का दुःख काहे रखना ...

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  2. उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

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  3. वाह...

    बेहतरीन गज़ल....
    सादर

    अनु

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  4. जो मिलना होगा मिल जायेगा वक्त पर।
    वक्त से पहले आखिर छटपटाते क्यों हो।

    सार्थक रच्ना ...!!
    शुभकामनायें

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