मंगलवार, 22 मई 2012

जो नहीं हो वो ही सबको बताते क्यों हो




जो नहीं हो वो ही, सब को बताते क्यों हो।

खुद की नज़र में खुद को, गिराते क्यों हो।



जो मिलना होगा, मिल जायेगा वक्त पर।


वक्त से पहले आखिर, छटपटाते क्यों हो।



असफल तुम ही नहीं, बहुत हुए हैं जहाँ में


असफलता ,पर  दुःख को, मनाते क्यों हो।



हार जीत सुख- दु ख, ये राही हैं जीवन के


इन से हौसला लो खुद को, रुलाते क्यों हो।



तुम्हारे सिवा, तुम्हारे साथ, कोई नहीं प्रेम 


लड़िये जंग खुद को, बेदम बनाते क्यों हो।






शुक्रवार, 11 मई 2012

शायरी तो आती नहीं




शायरी तो आती नहीं पर शायर बनना चाहता हूँ 
आशिकी तो आती नहीं आशिक बनना चाहता हूँ .

किस को दिल दूं जाकर किस से दिल लूं जाकर  
दीवानगी तो आती नहीं दीवाना बनना चाहता हूँ.

हाय  ढूँढूं कहाँ मैं उसको दिल मेरा चाहे जिसको 
मस्ती तो आती नहीं मस्ताना बनना चाहता हूँ . 

चाहत में जल जाऊँगा जल करके मिट जाऊँगा    
तड़पन तो आती नहीं परवाना बनना चाहता हूँ.   

शुक्रवार, 4 मई 2012

अहिंसा से भी लोग हिंसा कर देते हैं




अहिंसा से भी लोग हिंसा कर देते हैं 
तो बोलो ऐसी अहिंसा किस काम की.  

हित से भी लोग अहित कर देते हैं
तो बोलो ऐसा हित किस काम का . 

सकारात्मक भी नकारात्मक काम कर देते हैं 
तो बोलो ऐसी सकरात्मकता किस काम का. 

सोचिये !!समझिए, और  ऐसी जिन्दगी से बाहर 
निकलने की कोशिश कीजिए !

मैंने सही कहा या गलत ये आप सोचिये!!
अच्छा लगे तो गौर कीजिये!!  

 प्रेम  फर्रुखाबादी