सोमवार, 5 नवंबर 2012

जैसे चाहो वैसे तुम जियो जिन्दगी



जैसे चाहो वैसे तुम जियो जिन्दगी
पर याद रहे न हो कोई तुझसे दुखी 

अपने  तरह जो रखे सबका ख्याल

रखने लगे हर  कोई उसका ख्याल
आने लग जाती हर तरफ से ख़ुशी।
  
मस्त रहो मस्ती दो कहते हैं सभी
प्यार करो सबसे  नफरत न कभी
छोड़ दो घुटन को फैलाओ ताजगी।   
  
जैसे चाहो वैसे तुम जियो जिन्दगी
पर याद रहे न हो कोई तुझसे दुखी।

मंगलवार, 2 अक्तूबर 2012

जो जीते हैं सबके लिए



जो जीते हैं सब के लिए,सब जीते हैं उस के लिए
इस से बेहतर राह न कोई,इस से बेहतर चाह न कोई.
जो जीते हैं सब के लिए,
सब जीते हैं उस के लिए

अपनी दम पर जीवन जीना,आसान नहीं होता है
जो कहता उस जैसा कोई,नादान नहीं होता है

जो जीते हैं सब के लिए,सब जीते हैं उस के लिए

अपनी तरह गैरों का जो,रखता ख्याल हमेशा
जिस ने देखा जब भी उस को,हँसता खुशहाल देखा. 

जो जीते हैं सब के लिए,सब जीते हैं उस के लिए

कहने वाले  कह गए सब,जीवन जो ये जी के गए 
प्यार मुहब्बत से ही सब ,जीवन का रस पी के गए 
जो जीते हैं  सब के लिए,सब जीते हैं उस के लिए 

                                     -प्रेम फर्रुखाबादी 

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

स्वरचित अन्तरा,आदमी जो कहता है




आदमी जो कहता है  आदमी जो सुनता है
जिन्दगी भर वो सदायें  पीछा करती हैं.  

 (फिल्म - मजबूर - गीत  आनंद बक्षी )

पहली नज़र का प्यार प्यार होता है 
याद आये तो दिल बेकरार होता है 
भुलाने से नहीं भूलें, उसकी यादें 
झूठ नहीं कहता हूँ,बिल्कुल सच कहता हूँ 
उसकी मस्त अदाएं पीछा करती हैं...
(स्वरचित  अन्तरा - प्रेम फर्रुखाबादी )


आदमी जो कहता है  आदमी जो सुनता है
जिन्दगी भर वो सदायें  पीछा करती हैं.  

 (फिल्म - मजबूर - गीत  आनंद बक्षी )

शनिवार, 22 सितंबर 2012

स्वरचित अन्तरा,तेरे नाम के सिवा कुछ याद नहीं



तेरे नाम के सिवा कुछ  याद नहीं  
मुझे क्या हो गया  कुछ याद नहीं  
( फिल्म -अलग अलग  गीत आनंद बक्षी) 

उठते बैठते चलते फिरते 
तुझको ही बस सोचूँ 
कुछ कुछ होने लगता मन में 
मन को कैसे रोकूँ 
बंद हो या  खुली आँख हो 
देखूं तेरे ही नज़ारे 
तेरे नज़ारे लगते मुझको 
अपनी जां से प्यारे . (स्वरचित अन्तरा  प्रेम फर्रुखाबादी )    

तेरे नाम के सिवा कुछ  याद नहीं  
मुझे क्या हो गया  कुछ याद नहीं  

रविवार, 16 सितंबर 2012

स्वरचित अन्तरा, हम बेवफा हरगिज न थे



हम बेवफा  हरगिज न थे -  फिल्म शालीमार -  रचना आनंद बक्षी . 
आनंद बक्षी साहेब मेरी प्रेरणा  के स्रोत हैं।

हमने जो सपने कभी, देखे थे मिलके 

सपने वो अपने सब चूर हुए 
तुमने भी जिद की, हमने भी जिद की        
जिद में ही हम तुम दूर हुए 
मिलके रहें, सारी  उमर
हम ये दुआ कर न सके।    ( स्वरचित  अन्तरा - प्रेम फर्रुखाबादी )


मेरी इस अंतरा  का आनंद लीजिये।




शनिवार, 8 सितंबर 2012

जहाँ में जो भी आया मुहबत से ही आया




जहाँ में जो भी आया, मुहब्बत से ही आया 
आ कर जो  भी पाया, मुहब्बत से ही पाया ।  
मुहब्बत का दामन, कभी छोड़ना नहीं  प्रेम 
हर बुरे वक्त  में साथ दे,ऐसा  है यह साया। 

सोमवार, 2 जुलाई 2012

प्यार भरे मेरे दीवाने दिल को तोड़कर



प्यार  भरे  मेरे  दीवाने, दिल को  तोड़कर
ऐसे कैसे  जा  सकते हो, मुझको छोड़कर।

कसमें खायीं थीं तुमने, साथ निभाने की  

उलझी बातों की बातों से, बात बनाने की 
भूले सब कसमें अपनी ,मुख को मोड़कर। 

याद करो अपनी, पहली पहली मुलाकातें 

करते थे तुम मुझपे ,  प्यार भरी बरसातें 
मिल कर  जियेंगे यूँ  ही, रिश्ता जोड़कर।

चार दिनों में लगा कि, जैसे युग हो बीता 

थकते नहीं थे कहके डिअर डार्लिंग रीता   
तुमने तो रख दिया , मुझको झिंझोड़कर।

मंगलवार, 22 मई 2012

जो नहीं हो वो ही सबको बताते क्यों हो




जो नहीं हो वो ही, सब को बताते क्यों हो।

खुद की नज़र में खुद को, गिराते क्यों हो।



जो मिलना होगा, मिल जायेगा वक्त पर।


वक्त से पहले आखिर, छटपटाते क्यों हो।



असफल तुम ही नहीं, बहुत हुए हैं जहाँ में


असफलता ,पर  दुःख को, मनाते क्यों हो।



हार जीत सुख- दु ख, ये राही हैं जीवन के


इन से हौसला लो खुद को, रुलाते क्यों हो।



तुम्हारे सिवा, तुम्हारे साथ, कोई नहीं प्रेम 


लड़िये जंग खुद को, बेदम बनाते क्यों हो।






शुक्रवार, 11 मई 2012

शायरी तो आती नहीं




शायरी तो आती नहीं पर शायर बनना चाहता हूँ 
आशिकी तो आती नहीं आशिक बनना चाहता हूँ .

किस को दिल दूं जाकर किस से दिल लूं जाकर  
दीवानगी तो आती नहीं दीवाना बनना चाहता हूँ.

हाय  ढूँढूं कहाँ मैं उसको दिल मेरा चाहे जिसको 
मस्ती तो आती नहीं मस्ताना बनना चाहता हूँ . 

चाहत में जल जाऊँगा जल करके मिट जाऊँगा    
तड़पन तो आती नहीं परवाना बनना चाहता हूँ.   

शुक्रवार, 4 मई 2012

अहिंसा से भी लोग हिंसा कर देते हैं




अहिंसा से भी लोग हिंसा कर देते हैं 
तो बोलो ऐसी अहिंसा किस काम की.  

हित से भी लोग अहित कर देते हैं
तो बोलो ऐसा हित किस काम का . 

सकारात्मक भी नकारात्मक काम कर देते हैं 
तो बोलो ऐसी सकरात्मकता किस काम का. 

सोचिये !!समझिए, और  ऐसी जिन्दगी से बाहर 
निकलने की कोशिश कीजिए !

मैंने सही कहा या गलत ये आप सोचिये!!
अच्छा लगे तो गौर कीजिये!!  

 प्रेम  फर्रुखाबादी 
   


शनिवार, 31 मार्च 2012

तेरी सदा पर सदा देता चला जाऊँगा



तेरी सदा पर सदा देता चला जाऊँगा
हर मोड़ पर वफ़ा देता चला जाऊँगा

तुझे हर ख़ुशी नसीब हो मेरे दिलवर
दिल से ऐसी दुआ देता चला जाऊँगा

धूप में कहीं कुम्हला कर न रह जाये
छाया की तुझे घटा देता चला जाऊँगा

हर हालात में जीती रहो यह जिंदगी
जीने की हर अदा देता चला जाऊँगा




























बुधवार, 25 जनवरी 2012

जय माँ भवानी



 जय माँ भवानी

तेरे द्वार की माँ सीढ़ियाँ जो चढ़ गया है
जीवन में आगे ही आगे वो बढ़ गया है
मैं भी तेरी सीढियां यही सोचके चढ़ा हूँ
सुनले मेरी फ़रियाद तेरे सामने खड़ा हूँ

जय माँ भवानी, जय माँ भवानी,
जय माँ भवानी, जय माँ भवानी
करुँ तेरा गुणगान, करो मेरा कल्याण
करुँ तेरा गुणगान, करो मेरा कल्याण
जय माँ भवानी, जय माँ भवानी,
जय माँ भवानी, जय माँ भवानी

हर लो माँ सब दुःख मेरे
आ के पड़ा हूँ द्वार तेरे
तेरा ही अब मुझको सहारा
हरो मेरा व्यवधान,हरो मेरा व्यवधान।
जय माँ भवानी, जय माँ भवानी,
जय माँ भवानी, जय माँ भवानी

जीवन से मैं ऊब गया हूँ
भव सागर में डूब गया हूँ
नीचे ही गिरता जाता हूँ
करो मेरा उत्थान, करो मेरा उत्थान।
जय माँ भवानी, जय माँ भवानी,
जय माँ भवानी, जय माँ भवानी

कुछ भी मुझको भाये ना
कुछ भी समझ में आये ना
अज्ञानी हूँ मैं इस जग में
हरो मेरा अज्ञान ,हरो मेरा अज्ञान।
जय माँ भवानी, जय माँ भवानी,
जय माँ भवानी, जय माँ भवानी

हर किसी ने मुझको लूटा है
लगता हर रिश्ता झूठा है
झूठ नहीं मैं सच कहता हूँ
रिश्ता तेरा महान,रिश्ता तेरा महान।
जय माँ भवानी, जय माँ भवानी,
जय माँ भवानी, जय माँ भवानी



मँहगाई !




मँहगाई !

अब तो मार ही डालेगी मँहगाई
जीते जी ही खालेगी मँहगाई
बेबस हुआ है शासन सारा
लुटेरों ने लूट है मचाई।
अब तो मार ही डालेगी मँहगाई।

भला कोई खरीदे क्या खाये
कुछ भी समझ में न आये
हर मुख से निकल रही आई।
अब तो मार ही डालेगी मँहगाई।

कहीं मिलती नहीं असली चीजें
हर तरफ मिलती नकली चीजें
हर नीयत में खोट है समाई।
अब तो मार ही डालेगी मँहगाई।

दया करुणा कर गयी किनारा
छोड़ कर इंसानियत बेसहारा
मच रही हर तरफ हाय- हाय।
अब तो मार ही डालेगी मँहगाई।

कुछ लोग अपने घर में होते हुए भी बेघर होते हैं




कुछ लोग अपने घर में होते हुए भी बेघर होते हैं।

ये तो वो ही जाने वो कहाँ बैठते कहाँ पर सोते हैं।।


प्यार से वो देखते भी तो भला कैसे अपने पति को।

पति से ज्यादा तो प्यारे उनको उनके जेवर होते हैं।।


मजाल क्या कोई उनके हुश्न की तारीफ भी कर दे।

उन्हें देखो तो बड़ा ही कमाल के उनके तेवर होते हैं।।


देखने वाले तो देख ही लेते हैं किसी न किसी तरह।

दीदारे हुश्न को आशिक सचमुच ही बड़े बेडर होते हैं।।