शनिवार, 30 जुलाई 2011

बढ़ गये हैं आपस में, इतने बैर



बढ़ गये हैं आपस में, इतने बैर,

जी रहे सब एक -दूजे के, बगैर ।

जिसे भी देखिये, बदहवास लगे , 
किसे अपना कहे, तो किसे गैर 

हर कोई
अपनी ही, धुन में यहाँ,
कोई डूबा रहा तो, कोई रहा तैर 

कौन करे परवाह, यहाँ किस की, 
कौन पूछे किस को, दो पल ठैर 

देख रहा है हर कोई, घर में टीवी,
सिकोड़ कर बैठ गया, अपने पैर 

तन-मन से दुखी हैं, सब के सब,
निकल नहीं रहा, करने कोई सैर 

उलझा हुआ हर कोई, चिंताओं में
किसे फुरसत पूंछे, किसी की खैर 




सोमवार, 4 जुलाई 2011

तेरी मुहब्बत ने मुझको जिन्दगी दी है



तेरी मुहब्बत ने मुझको जिन्दगी दी है।
यह जिन्दगी मेरी बड़ी खूबसूरत की है।

होश संभाले हुए बढ़ रहा था धीरे धीरे

जिन्दगी क्या है तड रहा था धीरे धीरे
बड़ा ही मस्त मुझको तू ने बेखुदी दी है।

मुझे मालूम न था ये जिन्दगी क्या है
तुझसे मिलके मुझे आज पता चला है
जो अब तक न मिली तू ने वो ख़ुशी दी है।

मेरे हर सवाल का जवाब तुझसे मिला
अब क्या कहूँ तुझे पाके दिल ये खिला
धूप जैसी जिन्दगी में तू ने चाँदनी दी
है।

शनिवार, 2 जुलाई 2011

ऐ मेरे नादान दिल तू क्यों नहीं समझता है


मेरे नादान दिल तू क्यों नहीं समझता है।
जैसे चलती दुनिया वैसे क्यों नहीं चलता है।

पूरी दाल गल गयी अच्छी तरह से फिर भी
बीच दाल में रहके भी तू क्यों नहीं गलता है।

हर कोई
तुझे छल कर तुझसे आगे बढ़ गया
छले जाने पर भी बता तू क्यों नहीं छलता है।

मेरी बात को कभी समझने की कोशिश कर
सब फल गये जाने तू क्यों नहीं फलता है।