मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

कहीं मेरी जिन्दगी न यूँ ही गुजर जाये।



कहीं मेरी जिन्दगी न यूँ ही गुजर जाये।
सोच सोच कर मुझको यही डर सताये।

दूर तक मुझे कोई अपना नहीं दिखता
कोई दिखे तो यह जिन्दगी सँवर जाये।

बड़े-बड़े अरमान हैं इस दीवाने दिल के
हाय कहीं ये मेरी धड़कन न ठहर जाये।

मन नहीं करता है
तन्हा अब जीने को
आखिर यह मन जाये तो किधर जाये।

डूबे हुए हैं सब अपनी अपनी मस्ती में
किसको फ़िक्र कोई जिए या मर जाये

7 टिप्‍पणियां:

  1. बड़े-बड़े अरमान हैं इस दीवाने दिल के
    हाय कहीं ये मेरी धड़कन न ठहर जाये ..

    बहुत खूब कहा है प्रेम जी ... धड़कन रुक जाएगो तो अरमानों का क्या होगा ....

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  2. डूबे हुए हैं सब अपनी अपनी मस्ती में
    किसको फ़िक्र कोई जिए या मर जाये।

    सच्चाई की खूबसूरत अभिव्यक्ति।

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  3. बहुत सुन्दर तरीके से अपनी बात कही.. गज़ल खूब... सादर

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  4. जानदार और शानदार प्रस्तुति हेतु आभार।
    =====================
    कृपया पर्यावरण संबंधी इस दोहे का रसास्वादन कीजिए।
    ==============================
    शहरीपन ज्यों-ज्यों बढ़ा, हुआ वनों का अंत।
    गमलों में बैठा मिला, सिकुड़ा हुआ बसंत॥
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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  5. बहुत सुन्दर
    बहुत - बहुत शुभकामना

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  6. दूर तक मुझे कोई अपना नहीं दिखता
    कोई दिखे तो यह जिन्दगी सँवर जाये।


    sunder abhivyakti **********

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