रविवार, 16 जनवरी 2011

मँहगाई


मँहगाई
!


अब तो मार ही डालेगी मँहगाई
जीते जी ही खालेगी मँहगाई

बेबस हुआ है शासन सारा
लुटेरों ने लूट है मचाई।
अब तो मार ही डालेगी मँहगाई

भला कोई खरीदे क्या खाये

कुछ भी समझ में आये

हर मुख से निकल रही आई
अब तो मार ही डालेगी मँहगाई

कहीं मिलती नहीं असली चीजें

हर तरफ मिलती नकली चीजें

हर नीयत में खोट है समाई
अब तो मार ही डालेगी मँहगाई

दया करुणा कर गयी किनारा

छोड़ कर इंसानियत बेसहारा

मच रही हर तरफ हाय- हाय
अब तो मार ही डालेगी मँहगाई


3 टिप्‍पणियां:

  1. यकीनन नीयत में खोट है
    हर ओर मँहगाई की चोट है

    सुन्दर सामयिक रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. भला कोई खरीदे क्या खाये
    कुछ भी समझ में न आये
    हर मुख से निकल रही आई।
    अब तो मार ही डालेगी मँहगाई ...

    SACH HAI PREM JI ... PYUAAJ, TAMAATAR AUR PATA NAHI KYA KYA ... KYA HOGA DESH KA ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. भला कोई खरीदे क्या खाये
    कुछ भी समझ में न आये
    हर मुख से निकल रही आई।
    अब तो मार ही डालेगी मँहगाई।

    हर पाठक के मन की व्यथा को आपने शबदों में बांध लिया...वाह, बहुत बढ़िया।

    उत्तर देंहटाएं