मंगलवार, 30 नवंबर 2010

देखो मैं बेवफा नहीं हूँ यकीन कर लो ना



देखो मैं बेवफा नहीं हूँ यकीन कर लो ना।
मुहब्बत से जिन्दगी को हँसीन कर लो ना।।

कब तक यूँ ही धोखे खाते रहोगे यार तुम
थोड़ा तो अपने आपको जहीन कर लो ना।।

ये जिन्दगी क्या है गर समझना चाहो तो
अपनी सोच समझ को महीन कर लो ना।।

बनजारों की तरह जीना भी कोई जीना है
अपने नाम कहीं थोड़ी जमीन कर लो ना।।

7 टिप्‍पणियां:

  1. ये जिन्दगी क्या है गर समझना चाहो तो
    अपनी सोच समझ को महीन कर लो ना।।

    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द ।

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  2. बहुत सुन्दर गजल!
    हम तो जमीन ही तलाश कर रहे हैं अब तक।

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  3. ये जिन्दगी क्या है गर समझना चाहो तो
    अपनी सोच समझ को महीन कर लो ना।।
    वाह!

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  4. ये जिन्दगी क्या है गर समझना चाहो तो
    अपनी सोच समझ को महीन कर लो ना।।

    खूबसूरत रचना....
    बधाई
    http://veenakesur.blogspot.com/

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  5. आदरणीय मित्र ,
    जबलपुर की यात्रा के दौरान आपका साथ और प्यार मिला इसके लिए आपका बहुत धन्यवाद.
    मैंने भी एक छोटी सी पोस्ट लगायी है इस सम्मलेन पर . कृपया वहां भी पधारे.
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2010/12/blog-post.html
    आपका शुक्रिया , आपसे फिर मिलने की आकांक्षा है .
    धन्यवाद.
    आपका
    विजय

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  6. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति.........मेरा ब्लाग"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ जिस पर हर गुरुवार को रचना प्रकाशित साथ ही मेरी कविता हर सोमवार और शुक्रवार "हिन्दी साहित्य मंच" at www.hindisahityamanch.com पर प्रकाशित..........आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे..धन्यवाद

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