शनिवार, 6 नवंबर 2010

मेरी तरह मिलने की कभी फरियाद कर


मेरी तरह मिलने की कभी फरियाद कर
जैसे मैं करता वैसे तू भी कभी याद कर

बताओ कब तक सहनी पड़ेगी ये जुदाई
मुलाकात कर इस से कभी आज़ाद कर

मुझे उलझाकर क्यों खुद भी उलझ गये
छोड़ के शिकवे कर कभी आबाद कर

पिछले शुभ कर्मों का फल है जिन्दगी ये
इसको शाद रख प्रिये कभी नाशाद कर

4 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे उलझाकर क्यों खुद भी उलझ गये
    छोड़ के शिकवे आकर कभी आबाद कर।

    उलझे बिना सुलझती नहीं
    सुन्दर रचना

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  2. मेरी तरह मिलने की कभी फरियाद कर।
    जैसे मैं करता वैसे तू भी कभी याद कर।

    bahoot hi khubsurat. aabhar.

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  3. पिछले शुभ कर्मों का फल है जिन्दगी ये
    इसको शाद रख प्रिये न कभी नाशाद कर

    बहुत सही बात कही है ।
    शुभकामनायें ।

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  4. सराहनीय लेखन.....हेतु बधाइयाँ..ऽ ऽ ऽ
    +++++++++++++++++++
    चिठ्ठाकारी के लिए, मुझे आप पर गर्व।
    मंगलमय हो आपको, सदा ज्योति का पर्व॥
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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