शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

जय अम्बे जगदम्बे, कर दो हम सब का उद्धार


जय अम्बे जगदम्बे, कर दो हम सब का उद्धार।
हम सब आये तेरे द्वार, हम सब आये तेरे द्वार।
जय अम्बे जगदम्बे, कर दो हम सब का उद्धार।

अपनी भक्ति के रस में हम को रसमय कर दो
जीवन सारा सफल हो जाये ऐसा कोई वर दो
हम याद रखेंगे उपकार, हम याद रखेंगे उपकार
जय अम्बे जगदम्बे, कर दो हम सब का उद्धार।

देख लिया जीवन जी के तुझको बिन याद किये
पल भर भी सुख पाया नहीं है वाद-विवाद किये
खुद में उलझे रहे बेकार, खुद में उलझे रहे बेकार
जय अम्बे जगदम्बे, कर दो हम सब का उद्धार।

इस जीवन का मतलब क्या हम जान नहीं पाए
अपने हित में ही डूबे रहे हम परहित कर पाए
पाया जीवन आधार, पाया जीवन आधार।
जय अम्बे जगदम्बे, कर दो हम सब का उद्धार।

बड़ी-बड़ी आशाएँ लेकर हम तेरी शरण में आये
तेरी शरण में रहने वालों के देखे चेहरे मुसकाये
मैया अनुपम तेरा प्यार,मैया अनुपम तेरा प्यार।
जय अम्बे जगदम्बे, कर दो हम सब का उद्धार।

4 टिप्‍पणियां:

  1. जय अम्बे जगदम्बे, कर दो हम सब का उद्धार।
    सुन्दर भक्तिमयी रचना , हार्दिक बधाई...

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  2. मैं धन्य हुआ कि इस प्रातः बेला में माँ की स्तुति पढ़ने को मिली... आपका आभार!

    आपको दीप-पर्व की अनन्त-आत्मीय मंगलकामनाएँ...!

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