शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

मेरी मुहब्बत ने मुझपे क़यामत ही ढाई है


मेरी मुहब्बत ने मुझपे क़यामत ही ढाई है
जहाँ भी सुनता मेरी रुसबाई ही रुसबाई है

वो थे तो बहारों और नजारों का मौसम था
अब पास नहीं कोई बस मेरी ही तन्हाई है

पहले तो खुश किया फिर रुला दिया है तूने
क्या कहूँ खुदा ये तो
बस तेरी ही खुदाई है

पा भी सको मुहब्बत छोड़ भी सको
ये मुहब्बत भी तू ने क्या खूब ही बनाई है

7 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी मुहब्बत ने मुझपे क़यामत ही ढाई है।
    जहाँ भी सुनता मेरी रुसबाई ही रुसबाई है।

    वाह , सुन्दर पंक्तियाँ ।
    बढ़िया है प्रेम जी ।

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  2. पा भी न सको मुहब्बत छोड़ भी न सको
    ये मुहब्बत भी तू ने क्या खूब ही बनाई है।

    हकीकत!

    आशीष

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  3. पहले तो खुश किया फिर रुला दिया है तूने
    क्या कहूँ खुदा ये तो बस तेरी ही खुदाई है।

    ये खुदाई भी इत्ती गहरी है कि जो इसमे गिरा ता उम्र बहार नहीं आ पाता, बस बहार आने की कोशिश में ही जिंदगी गुज़र जाती है ........

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  4. पहले तो खुश किया फिर रुला दिया है तूने
    क्या कहूँ खुदा ये तो बस तेरी ही खुदाई है।
    कश्मकश का नाम है जिन्दगी

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  5. पा भी न सको मुहब्बत छोड़ भी न सको
    ये मुहब्बत भी तू ने क्या खूब ही बनाई है...

    इसी का नाम ही तो मुहब्बत है ... गले की हड्डी ...

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  6. भ्राताश्री,
    ‘हिन्दयुग्म’के रास्ते से होता हुआ मैं कब अचानक आपके ब्लॉग पर आ आ टपका, पता ही नहीं चला! आपका Profile देखकर आपमें मेरी दिलचस्पी जागी। मैं भी फ़र्रुख़ाबाद के छिबरामऊ में ही जन्मा हूँ। छिबरामऊ अब तो कन्नौज में है। डी.एन. डिग्री कॉलेज से ग्रेजुएशन करके कानपुर आ गया। अब सोनभद्र में अड्‌डा जमाए हूँ। शेष फिर कभी, फिलवक़्त जल्दी में हूँ... शुभ रात्रि!

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