मंगलवार, 31 अगस्त 2010

दास्तान- ए-दिल सुनाते तो किसे सुनाते



दास्तान- ए-दिल सुनाते तो किसे सुनाते।
कोई अपना न था बुलाते तो किसे बुलाते।

ग़मों के सिवाय जिन्दगी में कुछ भी नहीं
ग़मों से भला हम दुखाते तो किसे दुखाते।

धरे के धरे रह गये अरमान सब प्यार भरे
प्यार अगर अपना लुटाते तो किसे लुटाते।

मस्त बहारें हमें मस्त कर के चली गयीं
साथ साथ अपने घुमाते तो किसे घुमाते।

7 टिप्‍पणियां:

  1. क्या आपने हिंदी ब्लॉग संकलक हमारीवाणी पर अपना ब्लॉग पंजीकृत किया है?

    अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें.
    हमारीवाणी पर ब्लॉग पंजीकृत करने की विधि

    उत्तर देंहटाएं
  2. दास्तान- ए-दिल सुनाते तो किसे सुनाते ।
    कोई अपना न था बुलाते तो किसे बुलाते ।

    बहुत बढ़िया शेर .काफी दिनों बाद आपकी रचना पढ़ने मिली ......आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. धरे के धरे रह गये अरमान सब प्यार भरे
    प्यार अगर अपना लुटाते तो किसे लुटाते।

    बहुत खूब .... कमाल का शेर है ये ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. गंभीर प्रश्न है!
    आशीष
    --
    अब मैं ट्विटर पे भी!
    https://twitter.com/professorashish

    उत्तर देंहटाएं