मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

एक नहीं मैंने कई एक झटके खाये है

एक नहीं मैंने कई एक झटके खाये है।
तब जाकर हम यहाँ तक पहुँच पाए हैं।

उमर भर उनके सिर्फ नखरे उठाते रहे
तब कहीं जाके दोस्त वो मुसकराये हैं।

गर मिले गये वो तो शुक्रिया खुदा का
वरना अगले जन्म की आस लगाये हैं।

मेरी साँसे इस बात की गवाह बनी हुई
बस वो ही वो मेरी साँसों में समाये हैं।

11 टिप्‍पणियां:

  1. उमर भर उनके सिर्फ नखरे उठाते रहे
    तब कहीं जाके दोस्त वो मुसकराये हैं

    बहुत खूब लिखा है प्रेम जी ... दोस्त आसानी से नही मिलते ...

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  2. एक नहीं मैंने कई एक झटके खाये है।
    तब जाकर हम यहाँ तक पहुँच पाए हैं।
    और फिर शायद इसी का नाम तो जीवन है, झटके न हों तो शायद समतल सफर का आनन्द ही न आये
    बहुत सुन्दर रचना

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  3. गर मिले गये वो तो शुक्रिया खुदा का
    वरना अगले जन्म की आस लगाये हैं।
    वाह ! बढ़िया शेर है ...

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  4. सुन्दर रचना!
    आपके अनुभव सोचने को बाध्य करते हैं कि
    प्रणय में क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं!

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  5. मेरी साँसे इस बात की गवाह बनी हुई
    बस वो ही वो मेरी साँसों में समाये हैं।
    अत्यंत सुंदर भाव... प्रेम में गहरे समाये हुए...

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