रविवार, 11 अप्रैल 2010

ना वो पास आते ना वो पास बुलाते हैं


ना
वो पास आते ना वो पास बुलाते हैं
ना कुछ वो सुनते ना कुछ वो सुनाते हैं

उनका चुप रहना अब सहन नहीं होता
उनको बहलाने को उन्हें खूब घुमाते हैं

जाने कहाँ खोये रहते हैं जब देखो तब
उनके सजदे में कभी खुदको झुकाते हैं

कभी आँख से आँख मिली नहीं उनसे
दिल दुखता जब मुझसे आँख चुराते हैं

बिना बात किये दो दिल एक नहीं होते
जाने क्यों खुद को वो मुझसे छुपाते हैं

उनसे कहा चलो एक दूजे को भूल जाएँ
ना वो भूलते हैं ना वो मुझको भुलाते है

बड़ा ही मुश्किल हुआ उनको समझना
कभी खुद रोते तो कभी मुझे रुलाते है

उनकी इन्हीं अदाओं पर तो मैं मरता हूँ
ना गुदगुदी होती है ना वो गुदगुदाते हैं

4 टिप्‍पणियां:

  1. उनकी इन्हीं अदाओं पर तो मैं मरता हूँ
    ना गुदगुदी होती है ना वो गुदगुदाते हैं।



    बहुत अच्छी प्रस्तुति
    bahut khub

    http://kavyawani.blogspot.com/

    shekhar kumawat

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  2. जाने कहाँ खोये रहते हैं जब देखो तब
    उनके सजदे में कभी खुदको झुकाते हैं

    बहुत सुंदर प्रस्तुति है प्रेम जी .....

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