बुधवार, 7 अप्रैल 2010

बताओ मुझे तुम तड़पता क्यों छोड़ गये

बताओ मुझे तुम तड़पता क्यों छोड़ गये
दिल- दिमाग से तरसता क्यों छोड़ गये

क्या यही थी तेरे प्यार की गहराई दिलवर
दिल से लगा कर मचलता क्यों छोड़ गये

बैठके सकून से बातें भी नहीं कर पाये थे
तन-मन ये मेरा सुलगता क्यों छोड़ गये

कुछ कह जाते तो कुछ सुन जाते आखिर
मुझको बेसहारा सुबकता क्यों छोड़ गये

मेरी मुहब्बत मुझे मेरी भूल लग रही है
कैसे सम्भलूंगी धड़कता क्यों छोड़ गये

6 टिप्‍पणियां:

  1. बैठके सकून से बातें भी नहीं कर पाये थे
    तन-मन ये मेरा सुलगता क्यों छोड़ गये।
    बहुत खूब सुन्दर

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  2. सुन्दर गजल!
    इसकी चर्चा तो यहाँ भी है-
    http://charchamanch.blogspot.com/2010/04/blog-post_07.html

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  3. मेरी मुहब्बत मुझे मेरी भूल लग रही है
    कैसे सम्भलूंगी धड़कता क्यों छोड़ गये।

    good

    bahut khub


    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

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  4. सहज, सरल सुन्दर रचना है जो मन के भावनाओं को सामने रखता है !

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