शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

छोड़ दिया रे उसने मुझको जाने क्या सोचकर


छोड़ दिया रे, उसने मुझको, जाने क्या सोचकर।
तोड़ दिया रे, उसने दिलको,जाने क्या सोचकर।

ख्वाबों में बस वो ही वो, मुझको दिखती है
ख्यालों में बस वो ही वो
, हरदम खिलती है
मोड़ दिया रे, उसने मुझको, जाने क्या सोचकर।

दिल ही दिल में दिल उससे, बातें करता है
मन चाहे ढंग से उससे, मुलाकातें करता है
जोड़ दिया रे, गम से मुझको, जाने क्या सोचकर।

उसके बगैर जीने की, सोच नहीं सकता हूँ
किसी तरह मैं खुदको, रोक नहीं सकता हूँ
झिंझोड़ दिया रे, उसने मुझको, जाने क्या सोचकर।

9 टिप्‍पणियां:

  1. दिल दिल ही में दिल उससे बातें करता है
    मन चाहे ढंग से उससे मुलाकातें करता है
    जोड़ दिया रे गम से मुझको जाने क्या सोचकर।

    Bahut Sundar, Prem ji bahut dino baad dikhe ?

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  2. दिल दिल ही में दिल उससे बातें करता है
    मन चाहे ढंग से उससे मुलाकातें करता है
    जोड़ दिया रे गम से मुझको जाने क्या सोचकर।

    जुदाई में ही तो प्यार की कीमत पता चलती है

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  3. भावनाओं पर काबू रक्खो भइया!
    हुन्गामा से निपटना हँसी-खेल नही था!
    आपके साहस की दाद देता हूँ!

    बहुत बढ़िया गीत लगाया है।
    बार-बार गुनगुनाने को मन करता है।

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  4. दिल दिल ही में दिल उससे बातें करता है
    मन चाहे ढंग से उससे मुलाकातें करता है
    जोड़ दिया रे गम से मुझको जाने क्या सोचकर

    -क्या बात है!!

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  5. शाश्त्री जी से सहमत। विषय बदलते रहें, तो रस ज्यादा आता है।
    रचना अच्छी है।

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