सोमवार, 3 अगस्त 2009

काका जी का रोज़ पढ़े जो भी कुंडलिया छंद


काका जी का रोज़ पढ़े जो भी कुंडलिया छंद।
वो चिंता न बिल्कुल करे बस हो जाए निद्वंद।
बस हो जाए निद्वंद करे खुशियों का अनुभव
फ़िर जो भी काम करे काम हो जाये सम्भव।
कहे प्रेम कविराय लगाओ खूब भइया ठहाका
खुशियों के दाता हैं भारत के हाथरसी काका।

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपका तो वाकई कुंडलिया छंद है,
    परन्तु काका ने कुंडलिया छंद नही
    छक्के लिखे हैं।
    बधाई।

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  2. भाई जी
    काका जी ने भी कुंडलिया लिखी है मैंने खूब पढ़ी हैं नेट पर देखी जा सकती हैं

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  3. काका ने जो कुछ भी लिखा बेजोड लिखा --
    याद दिला दी आपने

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  4. आप सभी ब्लोगर मित्रों का मेरा हौसला बढाने के लिए दिल से धन्यबाद!!

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