गुरुवार, 27 अगस्त 2009

कोई मुझको यह बतादे कैसे उनको हम मनायें


कोई मुझको यह बतादे कैसे उनको हम मनायें
पहले की तरह दिलवर कैसे उनको हम बनायें

वफ़ा ही वफ़ा है दिल में नहीं वेवफा हूँ बिल्कुल
पर क्या करुँ यकीं यह कैसे उनको हम दिलायें

दिल चीर के कभी भी देख लें वो नजदीक आकर
प्यार ही है इस दिल में कैसे उनको हम दिखायें

जीना नहीं है जीना फ़िर भी जीने को जी रहा हूँ
हालत क्या हो गयी यह कैसे उनको हम बतायें

11 टिप्‍पणियां:

  1. नज़र भर के देखिये वे मान जायेंगी
    दिल के हालात खुद ही जान जायेंगी
    === बहुत खूब लिखा है आपने, अपना कर देखिये
    धन्यवाद

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  2. यकीन दिलाने की ज़रुरत कहाँ है, आपके एक एक शब्द में प्यार भरा है.
    एक उम्दा रचना के लिए बधाई.

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  3. बहुत शानदार ग़ज़ल है प्रेमजी..........
    बधाई
    बहुत बहुत बधाई !

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  4. वफ़ा ही वफ़ा है दिल में नहीं वेवफा हूँ बिल्कुल
    पर क्या करुँ यकीं यह कैसे उनको हम दिलायें।
    अच्छा कहा बहुत अच्छा कहा प्रेम भाई साहब। बधाई।

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  5. कोई मुझको यह बतादे कैसे उनको हम मनायें।
    पहले की तरह दिलवर कैसे उनको हम बनायें।
    धुरंधर ब्लॉगर हो भइया!
    तरकीब पता लगे तो हमें भी बताना।

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  6. आप सभी ब्लोगर मित्रों का मेरा हौसला बढाने के लिए दिल से धन्यबाद!!

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