रविवार, 23 अगस्त 2009

सैयां उसके बावरे, उस से लिपटत रोज


सैयां उसके बावरे, उस से लिपटत रोज।
लिपटके जाने कौन सी करते रहते खोज॥
करते रहते खोज खोज न पाए हैं कुछ भी।
तन टूटा और मन टूटा हो गए हैं भुस भी॥
कहे प्रेम कविराय जियो और जीने दो ना।
परमेश्वर पिता का सुबह-
शाम रस लो ना॥

10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या बात है दिल छू लेनी वाली लाजवाब रचना।

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  2. वाह ! आप तो कुण्डलियाँ भी रच लेते हैं.

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  3. अंतर्मन को आह्वान सार्थक है.
    बहुत अच्छी रचना

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  4. बहुत सही!

    गणेश चतुर्थी की मंगलकामनाऐं.

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  5. लाज़वाब..कविता..गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामना

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  6. वाह बहुत खूब! सुंदर रचना!

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  7. वाह!
    बहुत सुन्दर,
    मज़बूत कड़ियों से बहुत अच्छी तरह बुनी आपने यह कुंडली.

    बधाई...........

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  8. आप सभी ब्लोगर मित्रों का मेरा हौसला बढाने के लिए दिल से धन्यबाद!!

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