शनिवार, 1 अगस्त 2009

वो सामने से गुजरते हैं मुझको देखते हुए


वो सामने से गुजरते हैं मुझको देखते हुए ।
नज़रों ही नज़रों में अपना दिल फेकते हुए।

मेरी समझ में तो कभी कुछ भी नहीं आया
जाने उन्हें क्या मिलता मुझको छेड़ते हुए।

बात करना चाहो तो बात ही नहीं करते वो
अब मुझे भी मज़ा आने लगा उन्हें हेरते हुए।

हिम्मत जुटा के एक दिन मैंने कह ही दिया
आओ हम तुम जिन्दगी गुजारते खेलते हुए।

नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता है वो बोल पड़े
पाने से बेहतर लगे पाने को पापड़ बेलते हुए।

7 टिप्‍पणियां:

  1. yahi hota hai ek tarfa pyar me..
    waise kabhi kabhi maja bhi aata hai dil fekate huye..

    badhiya geet..

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  2. आप यूँ ही अगर रोज लिखते रहे,
    गीत-गजलों का अम्बार हो जायेगा।
    द्वार नव-गीत के सारे खुल जोयेंगे,
    एक दिन स्वप्न साकार हो जायेगा।

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  3. कैसा गुनगुनाता हुआ लिख देतें हैं ..

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  4. मेरी समझ में तो कभी कुछ भी नहीं आया
    जाने उन्हें क्या मिलता मुझको छेड़ते हुए

    उनको भी तो हक है दिल्लगी करने का........... लाजव्वाब रचना

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  5. आप सभी ब्लोगर मित्रों का मेरा हौसला बढाने के लिए दिल से धन्यबाद!!

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