शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

जैसे वो भूले हमें वैसे ही मैं भी भूल गई


जैसे वो भूले हमें वैसे ही मैं भी भूल गई
पर जब से सावन आयो मन तरसत है।
ठंडी - ठंडी हवा चले तन पर फुहार पड़े
पिया से मिलन की मेरी बड़ी हसरत है।
जब जब चमके हाय बादलों में बिजली
बिजली की कड़क संग दिल धडकत है।
बदन पर पानी गिरे गिरते ही जल जाए
दैया ऐसे आग मेरे अंग-अंग दहकत है।

14 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर लघु रचना... सावन के असर पर ;)

    पर जो मन बसिया हो
    ओ को कैसन भूली
    झांक तनिक जिया में
    सदा संग मैं बात मामूली

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  3. विरह -- प्रेम ---
    सुन्दर अभिव्यक्ति

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  4. ... बहुत सुन्दरता पूर्ण ढंग से भावनाओं का सजीव चित्रण... आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी… बधाई स्वीकारें।

    From- Meri Patrika : www.meripatrika.co.cc/

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  5. बहुत ही बेहतरीन लिखा है आपने ।

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  6. प्रेम जी,

    विरहाग्नि और सावन कुछ विचित्र ही नाता है बरसते पानी से आग और बढ़ जाती है।
    है ना अचंभा?

    सादर,


    मुकेश कुमार तिवारी

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  7. सच में भूलना इतना आसान नहीं होता............. अछे रचना है, प्रेम भरी

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  8. मेरा हौसला बढाने के लिए आप सभी ब्लागर मित्रों का दिल से धन्यबाद !!

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