शनिवार, 11 जुलाई 2009

बतलाओ मुझे आप क्यों रोने लगे हो


बतलाओ मुझे आप क्यों रोने लगे हो
आँसुओं से आँखें क्यों भिगोने लगे हो

टूटना बिखरना जिसकी आदत हो गई
उसे एक धागे में क्यों पिरोने लगे हो

रहना चाहते हो गर खूबसूरत फूलों में
तो जीवन में काँटे क्यों बोने लगे हो

पाहिचान बनानी तो हटके जीना होगा
गुम होकर पहिचान क्यों खोने लगे हो

जल्दी सो जल्दी उठो स्वस्थ रहोगे
देर सुबह तक आखिर क्यों सोने लगे हो



10 टिप्‍पणियां:

  1. टूटना बिखरना जिसकी आदत हो गई
    उसे एक धागे में क्यों पिरोने लगे हो।

    बहुत सुन्दर लगी यह शुक्रिया

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  2. रोने नही जी,
    हम तो आपके कविताओं मे खोने लगे है.

    बहुत बढ़िया..धन्यवाद

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  3. रहना चाहते हो गर खूबसूरत फूलों में
    तो जीवन में काँटे क्यों बोने लगे हो

    Sach kahaa ......... jeevan jena hai agar to kaante saaf karne chahiyen ... sundar bhaav hain is rachna mein

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  4. kante bo ke khoobsurat pholo me rahne ki sochna....boht badhi baat kahi aapne...

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  5. Aaj pahli baar aaya hun shayad par ab baar-baar aana hoga itni achchhi baaten padhne ko milin...sundar bhav hai aur darshnikta bhi jhalak rahi hai...ati-uttam...

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  6. बहुत सुंदर भाव के साथ आपकी लिखी हुई ये रचना मुझे बहुत अच्छा लगा!

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