मंगलवार, 30 जून 2009

अपने आप से अपना मुख क्यों मोड़ने लगे हो


अपने आप से अपना मुख क्यों मोड़ने लगे हो
दुनिया का दुःख जीवन में क्यों भोगने लगे।

कम से कम जो बोले वो ही प्यारा लगता है
यह जान कर भी ज्यादा क्यों बोलने लगे हो।

रिश्तों को कभी भी गहराई से मत देखिये
गहराई से देखके रिश्तों को क्यों तोड़ने लगे हो।

ख़ुद ही इन्सान गिरता और ख़ुद ही उठता है
फ़िर दोष दूसरों पर भैया क्यों थोपने लगे हो।

अपने ही हाथों में होता अपना भाग्य बनना
फ़िर आप अपने आपको क्यों कोसने लगे हो।

राज की बातें राज बना के रखना सीखो प्यारे
राज की बातें दूसरों से क्यों खोलने लगे हो।

नए मीत बने तो अपने गले लगाओ उन को
नए की खातिर पुरानो को क्यों छोड़ने लगे हो।

चाहने पर भी कोई आप को चाहना चाहे
ऐसे लोगों से आख़िर प्रीति क्यों जोड़ने लगे हो।

पहले सोचो समझो फ़िर अपना विवेक लगाओ
सोचे समझे बिना ख़ुद को क्यों झोकने लगे
हो।



14 टिप्‍पणियां:

  1. रच्छी सीख देती सुन्दर अभिव्यक्ति आभार्

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  2. बहुत ही सुन्‍दर रचना, अपने हर कदम को सोच समझ के उठाने की सलाह, बेहतरीन ।

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  3. ख़ुद ही इन्सान गिरता और ख़ुद ही उठता है
    फ़िर दोष दूसरों पर भैया क्यों थोपने लगे हो

    अच्छे भाव से सजी कविता, nek salaah det हैं apki kavitayen

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  4. आज के समाज पर बहुत अच्छी टिप्पणी,

    अपनी बात ही आज लोगो के समझ मे आती है,
    दूसरे की अच्छी बात भी अब कहाँ भाती है,
    कौन सोचता समझता है,आज बोलने से पहले,
    यहीं बात आज सारी रिश्तों को रूलाती है.

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  5. bahut sundar baat kahi hai aapane isame ek ek sachchi baat kahi hai .............bahut sundar

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  6. ख़ुद ही इन्सान गिरता और ख़ुद ही उठता है
    फ़िर दोष दूसरों पर भैया क्यों थोपने लगे हो।

    सच्ची बात....बहुत प्यारी रचना है आपकी प्रेम साहेब...जिंदगी के अलग अलग रंग बिखेरती और सिखाती हुई...
    नीरज

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  7. नए मीत बने तो अपने गले लगाओ उन को
    नए की खातिर पुरानो को क्यों छोड़ने लगे हो।
    प्रेम भाई।
    कुछ तो मौसम का मजा लो भइया,
    आप चादर के बदले में रजाई क्यों ओढ़ने लगे हो।
    सार्थक नज्म के लिए बधाई।

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  8. प्रेम जी,

    जीवन के सार से गर्भित गज़ल। जीवन को सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा देती हुई भली लगी और आपका रचनाधर्म भी।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  9. रिश्तों को कभी भी गहराई से मत देखिये
    गहराई से देखके रिश्तों को क्यों तोड़ने लगे हो।

    अपने ही हाथों में होता अपना भाग्य बनना
    फ़िर आप अपने आपको क्यों कोसने लगे हो।

    बेहतरीन रचना !
    जीवन को सही और गहरे मायने देती पोस्ट


    मेरी शुभकामनाएं !

    आज की आवाज

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  10. चंद पंक्तियों में ही बहुत कुछ सिखा गए. प्रयास सार्थक रहा.
    बधाई.

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  11. नेक सलाह जीवन की मुस्कान है. अच्छी ग़ज़ल के लिए शुक्रिया.

    - Hindi Poetry - यादों का इंद्रजाल

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  12. Kam se kam bole .......... wah kya baat hai

    bahut hi sunder lage aapke ye khyaal

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  13. बहुत ही उम्दा रचना लिखा है आपने!

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