गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

जब से तुझसे आँख मेरी लड़ गई रे



जब से तुझसे आँख मेरी लड़ गई रे
बिना पिए जैसे मुझे चढ़ गई रे


छुप कर तुझको देखने लगा हूँ
आँखें अपनी सेकने लगा हूँ
दिल की अंगूठी में तू जड़ गई रे।


रात भर मैं जगने लगा हूँ
ठंडी आहें भरने लगा हूँ
निंदिया मेरी आंखों से उड़ गई।


कुछ भी मुझको भाता नहीं है
समझ में कुछ भी आता नहीं है
तेरी चाहत में हालत बिगड़ गई रे।


5 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन प्रेम भाई. आशा है अब तबीयत दुरुस्त होगी. विमोचन में आप तबीयत की नासाजी से न आ सके, बहुत अखरा.

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  2. बहुत खूब।

    बचाया तेरी नजरों से मैं खुद को ऐ मेरे साथी।
    मेरे चेहरे को कैसे तुम छुपाकर पढ़ गई रे।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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