मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

आवहु तुम्हें बतावें अपने दिल की बात सहेली


आवहु तुम्हें बतावें अपने दिल की बात सहेली।
करवट बदल बदल कर रात लेटी रही अकेली।
रात लेटी रही अकेली सहेली मैं बिना पिया के
विरह के बस हो गए टुकड़े मेरे लाख जिया के।
कहे प्रेम कविराय सहेली कुछ तो जतन बतावहु
तुम ही को लें भर भेंट सहेली पास में आवहु।

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