रविवार, 19 अप्रैल 2009

पैरोडी राम बनके कभी श्याम बनके


कभी माता बनके
कभी पिता बनके
चले आना गुरूजी चले आना।

तुम दीपक रूप में आना
तुम दीपक रूप में आना
तम को दूर करने
मुझमें नूर भरने
चले अना गुरु जी चले आना

तुम रक्षक रूप में आना
तुम रक्षक रूप में आना
मेरी रक्षा करने
प्यार सच्चा करने
चले आना गुरु जी चले आना।

तुम आत्म रूप में आना
तुम आत्म रूप में आना
अपनी भक्ति जगाने
अपनी शक्ति दिखाने
चले आना गुरु जी चले आना।

तुम माझी रूप में आना
तुम माझी रूप में आना
भव से पार करने
मेरा उध्दार करने
चले आना गुरु जी चले आना।

तुम सपन रूप में आना
तुम सपन रूप में आना
मुझको राह दिखाने
मुझमें चाह जगाने
चले आना गुरु जी चले आना।

6 टिप्‍पणियां:

  1. तुम कवि रूप में आना,
    और लेखक बन के जाना,
    कभी हास्य लिखके,
    कभी व्यंग्य लिखके,
    चले आना प्रेम जी चले आना।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. मौसम ने करवट बदली है,
    प्रेम प्रीत ने ली अँगड़ाई।
    कविता में अभिव्यक्ति, भाव हैं,
    बगिया में छायी अमराई।।

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  3. बहुत बढिया ... साथ में टिप्‍पणियां भी अच्‍छी।

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  4. prem ji
    aaj to aapne gurubhav se pariporna kavita likhkar dil baag baag kar diya.sach aaj aise hi guru ki aavashyakta hai jo hamare man ke andheron mein jame andhkar ko door kar prakash kar sakein.

    bahut hi badhiya.

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  5. बहुत बढिया!! इसी तरह से लिखते रहिए !

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